भोजपुरी सिनेमा - 1948 से 2010 तक लेखक मनोज भावुक गंगा मैया के बाद - भोजपुरी सिनेमा - (1961 से 1967 ) पहली भोजपुरी फिल्म गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो के गीत पूर्वोत्तर भारत के गाँव-गाँव में गूंजने लगे. पांच लाख की पूंजी से बनी ' गंगा मइया...' ने लगभग 75 लाख रुपए का व्यवसाय की. इसे देखकर कुछ व्यवसायी लोग भोजपुरी फिल्म को सोना के अंडे देने वाली मुर्गी समझने लगे. नतीजा ये निकला कि भोजपुरी फिल्म निर्माण का जो पहला दौर 1961 से शुरू हुआ वो 1967 तक चल पडा .........इस दौर में दर्जनों फिल्में बनी लेकिन लागी नाहीं छूटे राम और विदेसिया को छोड़ कर कोई भी फिल्म अच्छा प्रदर्शन नही कर पाई. इन दोनों फिल्मों के गीत कमाल के थे.
भोजपुरी फिल्म के इस धमाकेदार शुरुआत के बावजूद दस साल 1967 से 1977 तक भोजपुरी फिल्मों का निर्माण लगभग बंद रहा. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की ये हालत भोजपुरिया संस्कार और संस्कृति को भोथरे छूरी से ह्त्या करने वाले फ़िल्मकारों के चलते हुई. 1967 से 1977 के अंतराल में जगमोहन मट्टू ने एक फिल्म मितवा भी बनाई, जो कि 1970 में उत्तर प्रदेश और 1972 में बिहार में प्रदर्शित की गई. इस तरह से ये फिल्म पहले और दूसरे दौर के बीच की एक कड़ी थी. भोजपुरी फिल्म (1977 से 1982 ) 1977 में प्रदर्शित दंगल की कामयाबी ने एक बार फिर नाजीर हुसैन को उत्प्रेरित कर दिया. जिसके बाद उन्होनें राकेश पाण्डेय और पद्मा खन्ना को शीर्ष भूमिका में लेकर बलम परदेसिया का निर्माण किया. अनजान और चित्रगुप्त के खनखनाते गीत-संगीत से सुसज्जित बलम परदेसिया रजत जयन्ती मनाने में सफल हुई. तब इस सफलता से अनुप्राणित होकर भोजपुरी फिल्म के तिलस्मी आकाश में निर्माता अशोक चंद जैन का धमाकेदार अवतरण हुआ और उनकी फिल्म धरती मइया और गंगा किनारे मोरा गाँव ने हीरक जयन्ती मनाई. भोजपुरी फिल्म निर्माण का ये दूसरा दौर 1977 से 1982 तक चला. 1983 में 11 फिल्मे बनीं ,जिनमें मोहन जी प्रसाद की हमार भौजी , 1984 में नौ फिल्मे बनी जिसमें राज कटारिया के भैया दूज, 1985 में 6 फिल्में बनी जिनमें लाल जी गुप्त की नैहर के चुनरी और मुक्ति नारायण पाठक की पिया के गाँव , इसके अलावा 1986 में 19 फिल्में बनी जिनमें रानी श्री की दूल्हा गंगा पार के हीट रही ,जिन्होनें भोजपुरी फिल्म व्यवसाय को खूब आगे बढाया.
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