भोजपुरी सिनेमा - 1948 से 2010 तक

लेखक

मनोज भावुक

पहली भोजपुरी फिल्म - गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबोGanga Maiya tohe piyari chadhaibo

अभी तक आपने देखा कि 1948 में जब फिल्मकारो को ये पता चल गया कि भोजपुरी में जादू है और इसकी मिठास लोगो को ललचा रही है.......ये उस घी की तरह है, जो जिस किसी भी भोजन में डाल दी जाए, उसे स्वादिष्ट बना देती है. नतीजा ये हुआ कि हिन्दी फिल्मकार भोजपुरी का इस्तेमाल सिर्फ छौंक लगाने के लिए करने लगे. .....लेकिन कोई भी एक सम्पूर्ण  भोजपुरी फिल्म बनाने के लिए तैयार नहीं था. लंबे इंतजार के बाद आखिरकार वो शुभ घड़ी भी आई, जब भोजपुरी फिल्म के लिए अनिश्चित काल तक बंद पडा निर्माण द्वार हमेशा-हमेशा के लिए खुल गया. इस बारे में पत्रकार आलोक रंजन ने भोजपुरी चलचित्र संघ के स्मारिका में लिखा है कि "16 फरवरी 1961  भोजपुरी सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक तिथि थी . आज के दिन पटना के शहीद स्मारक में भोजपुरी की पहली फिल्म ‘ गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो ’ का मूहूर्त समारोह संपन्न हुआ था और उसके अगले सुबह इस फिल्म की शूटिंग शुरू की गई. आज सोच सकते है कि हिन्दी फिल्म के क्षितिज पर एक नया शक्ति का उदय कितना क्रांतिकारी कदम रहा होगा. वो भी ऐसे समय में जब किसी से भोजपुरी फिल्म बनाने के बारे में बात करना भी बेवकूफ बनने की तरह था. लेकिन हर युग में ऐसे बेवकूफ और सनकी होते है जो युग निर्माण करते है. ऐसे ही एक सनकी थे नाजीर हुसैन. जिनको आज भोजपुरी सिनेमा का भीष्म पितामह कहा जाता है. नाजीर साहब भोजपुरी फिल्म बनाने के लिए बेचैन थे. भोजपुरी फिल्म बनाने की प्रेरणा उनको देशरत्न डा० राजेन्द्र प्रसाद से मिला था. राजेंदर बाबू के सामने जब नाजिर साहब ने अपने मन की इस बात को रखा था तो राजेंदर बाबू ने कहा था कि आपकी बात तो बहुत अच्छी है लेकिन इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए . और उतना हिम्मत अगर आप में हो तो फिल्म जरूर बनाइए. इतना  हिम्मत नाजीर साहब के पास था. उन्होंने एक स्क्रिप्ट लिखी जिसका नाम रखा- गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो और फिर वक्त की रफ़्तार के साथ निर्माता ढूंढने की उनकी कोशिश अनवरत जारी रही. ये अंधेरे से उजाले की ओर एक ऐसा सफ़र था जिसका सुबह कब, कहाँ और कैसे होगा ये इस समय किसी को भी नहीं पता था. चारो तरफ बस एक दर्दीला सन्नाटा पसरा था. इसी अंधेर के सफ़र में नाजीर साहब के हमसफ़र बनें - निर्माता के रूप में विश्वनाथ शाहाबादी, निर्देशक के रूप में कुंदन कुमार, हीरो के रूप में असीम कुमार और हिरोइन के रूप में कुमकुम .ये काफिला जब आगे बढ़ा तो इसमें रामायण तिवारी, पदमा खन्ना, पटेल और भगवान सिन्हा जैसे शख्सियत भी शामिल हो गए. गीत का जिम्मा शैलेन्द्र ने उठाया तो संगीत के जिम्मेदारी ली चित्रगुप्त जी ने. फिर क्या था, फिल्म ' गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो बनी और 1962 में रीलिज हुई .नतीजा ये कि गाँव तो गाँव शहर के लोग भी खाना-पीना भुल गए . जो वितरक इस  फिल्म को लेने से ना-नुकुर कर रहे थे , अब दांतो तले अंगूली काटने लगे थे. लोग जहां -तहां बतियाने  लगे थे  - गंगा नहाओ, विश्वनाथ जी के दर्शन करो और तब घर जाओ. इस फिल्म की खासियत थी दर्शक से इसकी आत्मीयता, दहेज़, बेमेल विवाह, नशाबाजी, सामंती संस्कार और अंधविश्वास से निकली समस्या, जो भोजपुरिया लोगों को अपनी जिन्दगी की समस्या लग रही थी . गीतकार शैलेन्द्र और संगीतकार चित्रगुप्त ने गीतों को इतना मोहक बनाया  कि गीत गली-गली बजने लगे.  

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