भोजपुरी सिनेमा - 1948 से 2010 तक लेखक मनोज भावुक भोजपुरी सिनेमा के नया युग या वर्त्तमान युग – 1982 से 2002 तक हालात ये हो गए कि कब फिल्म बने और कब पर्दे से उतर जाए इसका पता ही नही चलता था. ये समय भोजपुरी सिनेमा के लिए सबसे बुरा रहा. 2003 में मनोज तिवारी की ससुरा बड़ा पैसावाला के सुपर-डुपर हिट होने के बाद भोजपुरी सिनेमा का कायाकल्प हो गया. 2003 के बाद का समय भोजपुरी सिनेमा का नया युग या वर्त्तमान दौर कहा जाता है. आइए अब इस दौर के बारे में बात किया जाए . 2003 में मनोज तिवारी और रानी चटर्जी अभिनीत फिल्म ससुरा बड़ा पैसावाला सुपर-डुपर हीट हुई. भोजपुरी सिनेमा 2010 – आइए अब बात कर लिया जाए भोजपुरी सिनेमा के साल 2010 की.... 2010 भोजपुरी सिनेमा के लिए ना तो बहुत अच्छा रहा , ना ही बहुत खराब. इस साल की सबसे बड़ी उपलब्धि रही मनोज तिवारी की फिल्म भोजपुरिया डान को अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में मिला आमंत्रण. साथ ही भोजपुरी के दो स्टार मनोज तिवारी और श्वेता तिवारी का बीग बॉस सीजन -4 में जाना . 2010 में निर्माता प्रवेश सिप्पी जैसे फिल्मकार भी भोजपुरी सिनेमा जगत में आ गए. उनकी फिल्म मृतुन्जय पहली बार पूरे देश में एक साथ प्रदर्शित की गई. इस फिल्म की नायिका रिंकू घोष ने फिल्म विदाई से भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में जो मुकाम बनाया ,वो आज भी बरकरार है. मनोज तिवारी भोजपुरिया डान से वर्ष 2010 में दो साल बाद वापसी किए जिसका फ़ायदा इस फिल्म के साथ-साथ मनोज तिवारी को भी मिला. न्यू कमर्स हिरोइन में इस साल गुंजन पन्त ने अपनी फिल्म मार देब गोली , केहू ना बोली से टाप थ्री में जगह बनाईं. भोजपुरी के एक और सुपर स्टार विनय आनंद ने ननिहाल जैसी फिल्म के जरिए अपनी स्थिति मजबूत की. अनारा गुप्ता और संजय पाण्डेय ने भी कई हीट फिल्में दिए. पवन सिंह और मोनालिसा की एक और कुरुक्षेत्र चर्चा में रही. अगर फिल्म वितरण के हिसाब से देखा जाए तो इस साल अच्छा कमाई करने वाली फिल्म में ' देवरा बड़ा सतावेला, दाग, दामिनी, सात सहेलियां के नाम लिए जा सकते है. इन सब फिल्मों ने दो करोड़ से तीन करोड़ तक का व्यवसाय किया. साथ ही भइया के साली ओढनिया वाली, सैया के साथ मडैया में, लहरिया लूट ए राजाजी, ज़रा देब दुनिया तोहरा प्यार में , आज के करण-अर्जुन और रणभूमि ने भी अच्छा कमाई किया. लेकिन हमार माटी में दम बा, धर्मात्मा, बलिदान, तू ही मोर बालमा फिल्म से उसके निर्माता को निराशा हीं हाथ लगी. इसके बाद दिल, साथी रे , चंदू की चमेली ,तेज़ाब, किसना कइलस कमाल ने भी निराश किया. हिट-सुपर हीट के दृष्टि से देखा जाय तो निरहुआ नम्बर वन पर रहा. दाग ,सात सहेलियां, आज के करण-अर्जुन , शिवा निरहुआ की इस साल की सफल फिल्मे है. इस बीच पवन सिंह जहां थे वहां से आगे जरुर बढ़े है. देवरा बड़ा सतावेला, सैया के साथ मडैया में और भइया के साली ओढनिया वाली से पवन का मार्केट बढ़ा है. रवि किशन की फिल्मों की बात की जाए तो देवरा बड़ा सतावेला, लहरिया लूट ए राजाजी आ ज़रा देब दुनिया तोहरा प्यार में, ने ठीक-ठाक बिजनेस किया. अभिनेत्रियों की बात की जाए तो इस साल पाखी हेगड़े और मोनालिसा के लिए काफी अच्छा रहा. वर्ष 2010 में कुल 25 फिल्मे ही पूरे भारत में रीलीज हो पाईं, लेकिन निर्माता रमाकांत प्रसाद, राजकुमार पाण्डेय, दिलीप जायसवाल और अभय सिन्हा ने व्यावसायिकता के साथ-साथ प्रयोगवादी फिल्म भी बनाए. वर्ष 2010 जहां भोजपुरी सिनेमा के लिए सुखद रहा वहीं टू पीस बिकनी वाली कई फिल्मे पानी मांगने के लिए भी तरस गई. इससे ये बात तो साफ़ है कि भोजपुरी सिनेमा के दर्शक अब जागरूक हो रहे है और भोजपुरी की अस्मिता के साथ खिलवाड़ उनको बर्दास्त नही है. आने वाले साल इस साल से सबक जरुर लेगा और बेहतरीन फिल्मे बनेगी, ऐसा उम्मीद किया जा सकता है. निष्कर्ष- भोजपुरी सिनेमा में भाषा की बहुत गड़बड़ी है. एक ही घर में चार भाई चार तरह की भोजपुरी बोल रहे है जो कि बिल्कुल ही अव्यवहारिक है. .........मां के लिए बेटा हो का प्रयोग करता है तो भाभी के लिए रे का. ........भोजपुरी में सम्बन्ध और संबोधन का निर्वाह होता है जो कि फिल्मों में नहीं किया जा रहा है . गीतों में अश्लीलता और भोंडापन भरता जा रहा है. संगीत ज्यादातर घिसे-पीटे और copy - paste टाइप के है. कई ऐसे गीतों को दर्शको पर थोपा जाता है जिसका फिल्म की कहानी से कोई लेना-देना नही होता. इन्हे देख के लगता है कि किसी साफ कपडे में कोई पेवन चिपका दिया गया है. भोजपुरी है कुछ भी चल जाएगा का फार्मूला अभी भी चल रहा है. भेड़-चाल अभी भी जारी है. अधिकाँश फिल्मे पूर्वाग्रह से आज भी ग्रसित है. अभी भी फिल्मों में ठाकुर साहब रेप करते है और लाला जी मुन्सीगिरी करते दिख रहे है. भोजपुरी सिनेमा के लोगों को इस बात का ज्ञान कब होगा कि हमलोग दूसरे सहस्राब्दी के दूसरे दशक की शुरुआत कर चुके है. समय के साथ चलना पड़ेगा. भोजपुरी सिनेमा के शुरुआती दौर में गीतकार शैलेन्द्र , मजरुह सुल्तानपुरी , अनजान, ........................बीच के दौर में लक्क्षमण शाहाबादी ने जो गीत लिखे वो आज भी गुनगुनाए जाते है. उन लोगों ने मनोरंजन के साथ ही सामाजिक सरोकारो का भी निर्वाह किया. समाज के प्रति जबाबदेह रहे. लेकिन अब ये सब ख़त्म होता दिख रहा है. कामेडी और रोमांस के नाम पर हिरोइन की ढ़ोंढी दिखाने में आज के ज्यादातर फिल्मकारो को परम सुख की प्राप्ति होती है. ............भोजपुरी क्षेत्र की राज्य सरकारें भी भोजपुरी फिल्मों को लेकर उदासीन रवैया बनाए हुए है. जो बन जाता है उसी पर खुश होकर लोग तालियां बजा रहे है या लोग अश्लीलता - अश्लीलता चिल्लाते है. ऐसा क्यों हो रहा है, इस विषय पर गंभीरता से सोचने के लिए किसी के पास फुर्सत नहीं है. जिन सिनमाहॉलो में भोजपुरी फिल्में दिखाई जाती है,उनकी तकनीकी व्यवस्था कैसी हैं, एकोस्टिक यानी ध्वनि तंत्र काम करता है कि नही ..........आवाज साफ़ सुनाई देती है या नहीं. ........लोग गाने को कान से नहीं, आँख से सुनते है आखिर ऐसा क्यों ? इससे सरकार को कोई मतलब नहीं है. ........भोजपुरी फिल्म के उत्थान के लिए सरकारी सहयोग बहुत जरुरी है. साथ ही सरकार को एक ऐसी समिति का निर्माण करना होगा जो कि भोजपुरी सिनेमा पर नज़र रखे, अश्लीलता की परिभाषा और सीमा तय करे. अश्लील फिल्म बनाने वालो का खुल के विरोध करे और जो अच्छा फिल्म बना रहे है उन्हे सम्मानित करे. इसके अलावा वो फिल्म को व्यापक स्तर पर और विश्व स्तर पर प्रचार-प्रसार करे. फिल्म में भाषा की गड़बड़ी रोकेने के लिए भाषाविद रखें जाए. जो भी भोजपुरी फिल्मों में काम कर रहे है या करना चाहते है वो भोजपुरी भाषा और उसकी टोन सीखें. विश्व स्तर पर भोजपुरी की पहचान भोजपुरी फिल्मों से ही मिली है. अब भोजपुरी सिनेमा भोजपुरी समाज की और भोजपुरिया लोगों की जो तस्वीर पेश करेगी , उसी रूप में और उसी नज़र से दुनिया हमलोगों को देखेगी. भोजपुरी एल्बम इंडस्ट्री ने भोजपुरी का मतलब ही वल्गर बना दिया है. ............आने वाली फिल्मे भोजपुरी की गौरवशाली और वास्तविक तस्वीर पेश करेगीं , यही उम्मीद है और यही कामना है.
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