भोजपुरी सिनेमा - 1948 से 2010 तक लेखक मनोज भावुक भोजपुरी सिनेमा अब 50 साल का प्रौढ़ होने वाला है, लेकिन उम्र के इस पडाव पर भी इसमें प्रौढावस्था वाली गंभीरता नही दिख रही है .जैसे -जैसे इसकी उम्र बढ़ी है, लड़कपन बढ़ता गया है . ये इसका ऐसा लड़कपन है जिसे समय और इतिहास कभी माफ़ नही कर सकेगें और अब तो इस पर ये कहावत भी चरितार्थ हो रही है कि जिस डाल पर बैठे है,उसी को काट रहे है. मै भोजपुरी सिनेमा पर पीछले डेढ़ दशक से लिख रहा हूं.. अब तक करीब 50-60 भोजपुरी फिल्मों को कई-कई बार देखने के बाद, फिर से कुछ लिखने का विचार मन में आया है . हाल ही में 26 दिसंबर 2010 को एयरपोर्ट अथारिटी ऑफ़ इंडिया के आफिसर्स क्लब में भोजपुरी सिनेमा के 50 साल के सफ़र के बारे, मैने भोजपुरी सिनेमा के इस दौर के सुपर स्टार मनोज तिवारी से विस्तार से बातचीत की, जिसका प्रसारण कई बार हमार टी वी पर किया गया. फिल्मी दुनिया में भोजपुरी का प्रवेश फिल्मी दुनिया में भोजपुरी के प्रवेश की कहानी बड़ी रोचक है. मुम्बई के फिल्म संसार में भोजपुरी का विजय प्रवेश भोजपुरी गीतों के माध्यम से हुआ और इसका श्रेय अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन के भूतपूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय मोती बी ए जी को जाता है. सन 1948 में एक फिल्म बनी नदिया के पार , जिसके निर्देशक थे किशोर साहू. ये फिल्म मछुआरों और मल्लाहों की जिन्दगी पर आधारित थी , जिसके संवाद अवधी में थे और इसके 8 गीत भोजपुरी में थे . जिसमें से अधिकांश गीत दिलीप कुमार और कामिनी कौसल पर फिल्माए गए थे. इन गीतों को मोती बी ए जी ने लिखे थे. आलम ये था कि इन गीतों को जो भी सुने वो इसकी तारिफ किए बिना ना रह सके. इन गीतो को सुनकर लोगों के मुंह से अनायास ही हाउ स्वीट , हाउ स्वीट निकलता था, फिर क्या था लोगों को भोजपुरी गीतो का चस्का लग गया और इसके साथ ही हिन्दी फिल्मों में भोजपुरी गीत रखे जाने का रिवाज चल गया . जरा कल्पना कर के देखिए बंगाली, पंजाबी, गुजराती और मराठी माहौल में भोजपुरी का ये शानदार प्रवेश कितना सुखदायी रहा होगा. भोजपुरिया स्वाद लोगों को अच्छा लगा तो, हिन्दी सिनेमा में इसका इस्तेमाल चखना के रूप में होने लगा . लेकिन लोगो को हिन्दी फिल्मों में भोजपुरी के गीत या भोजपुरिया टोन या इसका मिजाज तो अच्छा लगा, मगर पूरा का पूरा फिल्म भोजपुरी में बनाने के लिए कोई भी तैयार न था.
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