अमेरिका नियंत्रित विश्व ग्राम का भविष्य Copyright © Dr. Amit Kumar Sharma पेज 1 (1) हाल ही में अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने यह बयान दिया है कि अमेरिका तालिबान के उदारवादी तत्वों के साथ बातचीत कर सकता है। इसे अमेरिका की अफगान नीति में पहले बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। इसी के साथ ओबामा ने यह भी स्वीकारा है कि अफगानिस्तान में अमेरिका को अपेक्षित विजय नहीं मिल पायी है। संगठन से ज्यादा एक अतिवादी विचारधारा में तब्दील हो चुके तालिबान में उदारवाद की कोई गुंजायश नजर नहीं आती। ओबामा इराक में उदारवादी नेताओं के साथ हुई वार्ताओं के तर्ज पर शायद वैसी ही उम्मीद अफगानिस्तान से भी लगाए बैठे हैं। परंतु इराक में अलकायदा की दमदार उपस्थिति के बावजूद वहां ऐसी व्यवस्था कायम रही जिसमें उदारवादी तत्वों की पहचान कर बातचीत की संभावना तलाशी जा सकी, लेकिन अफगानिस्तान में अतिवादी ऐसी तमाम व्यवस्थाओं को पहले ही नेस्तनाबूद कर चुके हैं। अत: ओबामा की मंशा से अमेरिका पर से दुनिया का भरोसा कम होगा। इसका फायदा अंतत: अतिवादियों को ही होगा। इससे पाकिस्तान को अफगानिस्तान में रणनीतिक रूप से दखल देने का मौका मिलेगा। ऐसे भी पाकिस्तान में जरदारी की स्थिति दिनों -दिन खराब हो रही है। नवाज शरीफ , मुसर्रफ और कियानी के विरोध का लाभ अंत में फौजी शासन में ही होगी। और सैनिक तानाशाहों के मॉडेल जियाउल हक ही रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ओबामा यह सब नहीं समझ रहे है ? उनके सलाहकार और सी. आई . ए. वाले यह सब नहीं समझ रहे हैं ? या समझने के बावजूद लाचार हैं। मंदी और मंहगाई के मार झेल रहे अमेरिका की भीतरी हालत सोवियत युनियन की तरह हो गई है और जिस तरह अफगानिस्तान में हस्तक्षेप सोवियत साम्राज्यवाद का अंतिम अभियान था और उसके बाद वह टुकड़ों में बिखर गया ठीक उसी तरह अमेरिका की भीतरी हालत काफी खराब है और अफगानिस्तान तथा इराक एवं पाकिस्तान के बीच फंसा अमेरिका हर हालत में इससे बाहर आना चाहता है। पिछले तीस वर्षों से अमेरिका अपनी ''नवाबी'' बचाने के लिए बहु बेगम / मेरे हुजूर जैसे दिवालिया हो चुके नवाबों जैसा व्यवाहार करते करते थक और टूट चुका है। आम अमेरिकी ऐसे अभियानों को फालतु , खर्चीला और अनावश्यक मानता है। उसकी आर्थिक हालत वैसी हो गई है जैसी द्वितीय विश्व युध्द के बाद ईग्लैंड या फ्रांस की थी और कोल्डवार के बाद सोवियत युनियन की थी। अमेरिका वियतनाम में हार चुका है और उसे वापिस लौटना पड़ा था। ईराक और अफगानिस्तान से भी वह अजीज आ चुका है। उसे देर- सबेर वापिस लौटना पड़ेगा। और यह अमेरिकी साम्राज्यवाद का अंत होगा । तब अमेरिका आस्ट्रेलिया, कनाडा या यूरोपीय युनियन तथा जापान की तरह एक उत्तारआधुनिक राष्ट्र-राज्य होगा। अपने में मगन तथा मदहोश।
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