
राग धनाश्री
तब तैं बाँदे ऊखल आनि |
बालमुकुंददहि कत तरसावति, अति कोमल अँग जानि ||
प्रातकाल तैं बाँधे मोहन, तरनि चढ़यौ मधि आनि |
कुम्हिलानौ मुख-चंद दिखावति, देखौं धौं नँदरानि ||
तेरे त्रास तैं कोउ न छोरत, अब छोरौं तुम आनि |
कमल-नैन बाँधेही छाँड़े, तू बैठी मनमानि ||
जसुमति के मन के सुख कारन आपु बँधावत पानि |
जमलार्जुन कौं मुक्त करन हित, सूर स्याम जिय ठानि ||
भावार्थ :--
`तभीसे लाकर तुमने कन्हैयाको ऊखलमें बाँध दिया है | यह जानकर (भी) कि
बाल-मुकुन्दका शरीर अत्यन्त कोमल है इन्हें क्यों तरसाती (पीड़ा देती) हो? मोहन को
तुमने सबेरेसे ही बाँध रखा है और अब तो सूर्य मध्य आकाशमें आ चढ़ा (दोपहर हो गया)
है |'
(इस प्रकार गोपी) मलिन हुए चन्द्रमुखको दिखलाती हुई कहती है कि--`तनिक देखो तो
नन्दरानी ! तुम्हारे भयसे कोई इन्हें खोलता नहीं, अब तुम्हीं आकर खोल दो | कमल
लोचनको बँधा ही छोड़कर तुम मनमाने ढ़ंगसे बैठी हौ |' सूरदासजी कहते हैं,श्यामसुन्दर
ने यमलार्जुनको मुक्त करनेका मनमें निश्चय करके यशोदाजीके चित्तको सुख देनेके लिये
स्वयं (अपने) हाथ बँधवा लिये हैं |' (नहीं तो इन्हें कोई कैसे बाँध सकता है |)
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See the record in Limca Book of Records 2012 on Page No. 217