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शैव्या

सौरभ कुमार

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शैव्या

  

"ओ भगवान वासुदेव", "ओ भगवान वासुदेव" यह कहकर उसका सारे अंगों के साथ हिलता शरीर। कृष्ण के स्मृति में वह श्यामल छरहरी लंबी युवती जीवंत हो उठी। कृष्ण को लगा वे अब उसे उपेक्षित नहीं कर सकते। यह कुछ ऐसी समस्या है जिस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। वासुदेव की साधना में निमग्न शैव्या को इस तरह अपने नियति पर वासुदेव कृष्ण नहीं छोड़ सकते। भले हीं वह अपने चाचा श्रृंगालव्य को हीं वासुदेव समझती है। अगर अज्ञान में डूबा हुआ शिष्य गुरु को ढूंढ़  सकता तो कृष्ण उसे अपने अज्ञान पर छोड़ सकते थे। लेकिन सत्य तो यह है कि उसकी प्यास वासुदेव के प्रति सच्ची है। उसकी लगन वास्तविक है। धोखा खाने वाला अगर सत्य को जाने हीं तो धोखा क्यूँ खाये। ऐसा तो हमेशा होता आया है और आगे भी ऐसा हीं होगा। ऋत जब नैतिक नियम बन कर धरती पर आता है तो उसके आने की पहले से हीं चर्चा रहती है। लोगों की आशा लगी रहती है। भविष्यवाणी हुई हीं रहती है। आत्मा जब सत्य बन कर अपने युग में आये ऐसा लोग प्रतीक्षा में लगे रहते हैं। जिस तरह एक वर्ग में एक हीं व्यक्ति प्रथम आता है लेकिन उस वर्ग के अन्य प्रतिभाशाली छात्र भी उसी स्थान का दावा करते हैं उसी तरह ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए कई आत्मा उद्यमशील हो जाते हैं। उनके आसपास का समुदाय भी विचलित हो उठता है। इसे वासुदेव की कृपा उन पर से नहीं उठ जाती। इसलिए अगर करवीरपुर राज्य में फैले इस श्रृंगालव्य के आचारण का नग्न होना अनिवार्य है वहीं शैव्या के जीवन में वासुदेव कृष्ण के आत्मा का सत्य का भी प्रवेश अवश्यंभावी की तरह हो गया है।

यह भारत है, कितना हीं संशय बढ़े सत्य को वास्तविक रूप से जाननेवाले भारत में कुछ न कुछ लोग बचे हीं रह जाते हैं। आत्मा का सत्य होना पाये जाने के लिये नहीं होता, जिसे साधना से पाया जाना हो। साधना कर खुद को भगवान मनवाना चाहनेवाले लोग जब वातावरण को उस तरह होता नहीं देख पाते तो उनका धैर्य टूट जाता है और वे श्रृंगालव्य, पौण्ड्रक की तरह दबाब देना शुरु कर देते हैं और अधर्माचरण बढ़ जाता है। सत्य तो यह है जो कारण शरीर में है उसी की अभिव्यक्ति सूक्ष्म और स्थूल में भी है। इसलिए भारत का सामुद्रिक अपनेआप भगवत्ता को स्थूल शरीर में भी ऐश्वर्य के छ: गुणों की घोषणा कर देता है। इस सत्य को जाने बिना वह करवीरपुर को जिस तरह से श्रृंगालव्य के लिए संभाल रही है उसमें उसे लांक्षण हीं हाथ आयेगा। वासुदेव की भक्ति उसे वासुदेव कृष्ण के सन्मुख जाकर हीं प्रणत हो सकता है। जिस तरह पुरूष के लिए कांतासम्मत सलाह की जरूरत होती है उसी तरह स्त्री के लिए भी।

करवीरपुर की वास्तविक सत्ता राजकुमारी शैव्या हीं संभालती है। शैव्या जैसे-जैसे बचपन से बढ़ती गई वैसे-वैसे हीं उसका प्रभाव भी बढ़ गया। श्रृंगालव्य साधक था, उसकी साधना भी बढ़ती गई। उसके भीतर ईश्वरीय गुण भी आने लगे। अपने भीतर वासुदेव तत्व को पाकर अपेक्षा का शिकार हो गया। ज्योंही वासुदेव के प्रकट होने की संभावना उसे कम हुई लगी वैसे हीं वह शुरू में वासुदेव के कर्त्तव्य पूरा करने और बाद में खुद को हीं वासुदेव साबित करने के मिथ्या संसार में धसता चला गया। जिन ऋषि-मुनियों ने उस वासुदेव नहीं माना उससे खुद को संभालने की जगह वह कारावास का मंजिल उन्हें दिखाने लगा। शैव्या की स्नेह मिश्रित भक्ति से उसे सांत्वना और बल मिलने लगा। रानी और पुत्र से वह अलग होता चला गया। शैव्या का प्रभाव बढ़ा और रानी उपेक्षिता होती गई। श्रृंगालव्य अहंकारी होता चला गया। राजनय संबंध, प्रशासन, और सेना शैव्या के निर्देशन पर चलने लगा। शैव्या जब सोमनाथ गई थी तो गुरू सांदीपनि के आचार्य शिष्य श्वेतकेतु को अपने साथ करवीरपुर लेते आई। श्वेतकेतु शैव्या के सौन्दर्य से अभिभूत था और शैव्या इस सत्य को जानकर हीं उसे प्रोत्साहित करती थी। वह खुद श्रृंगालव्य के आज्ञा से एकदिन श्वेतकेतु को अपनाना चाहती थी। जनसमाज में अपनी भूमिका को लेकर शैव्या कई कही जानेवाली चर्चा की शिकार थी।

श्वेतकेतु ब्राह्मण है, उसने श्वेतकेतु को अपनाना चाहा जबकि वह खुद रजोगुणी है। उसके भीतर ऐश्वर्य की चाह है। अपनी भक्ति के साथ वह तप का बल अर्जित कर पाई है। खुद शैव्या श्रृंगालव्य के विपरीत अपने लिए वीतरागी हीं कही जायेगी। जिस राह पर शैव्या जा चुकी है उस पर बिना वासुदेव के उसे अशांति हीं मिलनी है। ईश्वर को ऊँचे व्यासपीठ पर बैठने वाले तपस्वी की तरह ना स्वयं को भगवान कहने की आकांक्षा होती है ना कहवाने की लालसा हीं। ईश्वर के लिए तो अपने तरफ से दिया जानेवाला स्नेह ही अर्थ रखता है। श्रृंगालव्य इस रहस्य को अगर समझ हीं जाता तो खुद कृष्ण को उसका अंत नहीं करना पड़ता।

कृष्ण ने श्रृंगालव्य का अंत कर दिया। उसके कारागार के कैद से मुक्त हो सबों को जीवन मिल गया। शैव्या अपने भीतर इस आध्यात्मिक विप्लव को बर्दाश्त नहीं कर पायी। अब गद्दी पर वे थे जो शैव्या के कारण उपेक्षित हो गये थे। वह करवीरपुर में अब नहीं रह सकती थी। अब वह उसी कृष्ण के साथ माता देवकी के संरक्षण के लिए जा रही थी। उसके भीतर का माधुर्य फिलहाल समाप्त हो चुका था। वह अब भी कृष्ण को परास्त करने की तीव्र आकांक्षा से भरी हुई थी। कृष्ण का स्नेह अब भी जिस तरह उसके तरफ था उससे वह कृष्ण के अंत के लिए उत्तेजित होते जा रही थी। या तो वह कृष्ण को समाप्त करे या कृष्ण के विस्तृत प्रेम के स्पर्श में समा जायेगी उसे ऐसा लगने लगा था। जैसा उसे कृष्ण के परिवार से स्नेह मिला उसमें उसे अपने अतीत के अस्तित्व को जीवित रखने के लिए वह भी अपने अंतिम छोड़ पर जाकर कृष्ण की मृत्यु की कामना और साध कर बैठी।

श्वेतकेतु उसके तरफ से अब उदासीन हो चुका था। उसका ब्राह्मण का जीवन असंतुलित हो चुका था। करवीरपुर में श्रृंगालव्य के अंत ने उसे जिंदगी में घुमा कर फिर उसे वैदिक जीवन के रास्ते पर हीं ला दिया था। गुरू सांदीपनि ने अपनी उदारता से उसे अपना लिया। जहाँ गलती की जगह हीं न हो वह मानव का जीवन नहीं है। शैव्या के लिए इस मन:स्थिति के कारण माता देवकी के संरक्षण में रहना कठिन होता जा रहा था। कृष्ण के चचेरे भाई और सखा उद्धव के लिए कन्या का चुनाव होना था। शैव्या के सामने अब आचार्य श्वेतकेतु और उद्धव सामने थे। परंतु शैव्या अपने भीतर के आध्यात्मिक सत्य की परीक्षा कर रही थी। वह जहाँ थी वहाँ से उसे अब या तो कृष्ण को खत्म करना था या उसे अपने जीवन के लिए नये सिरे से खड़ा होना था। उसके भीतर का माधुर्य सूख चुका था। उसके लिए सत्य की प्राप्ति सबसे बड़ा सवाल था। वह अविवाहित रह सकती है पर बिना सत्य को पाये नहीं रह सकती। कृष्ण जान रहे थे खुद शैव्या के मन में किस तरह वह उपेक्षित किए जा रहे थे। लेकिन उनकी वही स्मिति थी, वही स्नेह चारों ओर फैल रहा था।

शैव्या आजकल जगी रह कर भी सपने में खो जाती है। वह श्वेतकेतु और उद्धव दोनों से आगे जा चुकी है। अब वह मगध सम्राट जरासंध के व्यूह के विपरीत राजकुमारी रूक्मिणी के स्वयंवर के लिए कुण्डिनपुर जा रही है। जिस तरह शिशुपाल से रूक्मिणी के विवाह के लिए नकली स्वयंवर का खेल खेला जानेवाला था उसमें रूक्मिणी को सत्य पर टिके रहने के लिए वह शक्ति देने जा रही थी। जब वह माता देवकी के संरक्षण में आई थी तो वह अपने भीतर कृष्ण के लिए प्रतिशोध की ज्वाला लिए हुये थी, कृष्ण ने उसके जीवन स्वप्न को धूल में मिला दिया था। अब वह जब मात देवकी के संरक्षण से जा रही है तो वह भरी हुई है। उसका स्वप्न जागे हुये में हीं जैसे चैतन्य हो गया था। उसे अनुभव हुआ उसने कृष्ण का वध अपने हाथों से कर दिया है। कृष्ण के अधर पर अब भी वही स्मित है, आँखे अब भी शान्ति से डूबी हुई है। उसे खुशी हुई परंतु जिस तरह उसने कृष्ण के लिए बाकी की प्रतिक्रिया को अपने भीतर देखा, जिस तरह उसने इस जगत को हीं सू्ना देखा उसने शैव्या के सत्य को सामने रख दिया। जिस तरह कृष्ण की मृत्यु उसकी हीं अपनी मनोलोक की रचना थी वैसे ही अन्य की भावना भी उसका अपना हीं मनोलोक था। शैव्या का सत्य आज उसके सामने था। उसका वासुदेव से परिचय हो चुका था। जो अपने भीतर के उपेक्षा और द्वेष के बदले स्नेह हीं देता हो वह हीं संपूर्ण रूप से वासुदेव हो सकता है। उसका वासुदेव के प्रति तीव्र द्वेष गिर चुका था। वह वासुदेव के प्रेम में बंध चुकी है। परंतु प्रेम जब इस प्रकार समुद्र की लहर की तरह बढ़े तो फिर पाने की आकांक्षा नहीं रहती। उसका जीना होकर रह जाता है। एक समय कृष्ण का स्नेह उसकी ओर था और वह उपेक्षा से भरी हुई थी तो आज जब वह प्रेम से भरी है तो वह कृष्ण के प्रेम के प्रतिदान की अपेक्षा नहीं रखेगी। वह इनसे दूर जायेगी। जैसे भी हो वह जायेगी। उसे अवसर भी मिल गया। अब वह मिथ्यात्व और दंभ के विपरीत खड़ी होगी। सुर वही होते है पर अगर उनका आधार बदल जाये तो सुर की पहचान बदल जाती है। उनका महत्व बदल जाता है। अब इस वासुदेव के सत्य के आधार पर शैव्या का सत्य गूँजेजा। वह कृष्ण के लिए कृष्ण से दूर जायेगी।

वह रूक्मिणी के सामने खड़ी है। ऐसा क्यूँ होता है? आदमी वही हो और धरातल बदल जाता है। संभावना बदल जाती है। एक तरफ कृष्ण से प्रेम करने वाले थे और दूसरी तरफ अपने अपेक्षा में खड़ी शैव्या थी। आज अपने भावना में वह गति के बावजूद शांत है और दूसरी तरफ ग्वाले कृष्ण के प्रेम में खड़ी राजकुमारी अपने जगत के विरोध के सत्य के साथ संघर्ष कर रही है।  शैव्या कृष्ण को पाने में रूक्मिणी को साथ देने आई है। कृष्ण को।        

    

 

 

  सौरभ कुमार का साहित्य  

 

 

 

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