मुंशी प्रेमचंद

वरदान

25 विदाई

पेज- 78

विरजन (धीरे–से) उसे न छडों। बेचार, अपने घ्यान में मग्न हैं। सुवामा को देखा तो निकट आकर उसके चरण स्पर्श कियें। सुवामा ने उन्हें उठाकर हृदय में लगाया। कुछ कहना चाहती थी, परन्तु ममता से मुख न खोल सकी। रानी जी फूलों की जयमाल लेकर चली कि उसके कण्ठ में डाल दूं, किन्तु चरण थर्राये और आगे न बढ सकीं। वृजरानी चन्दन का थाल लेकर चलीं, परन्तु नेत्र-श्रावण –धन की भति बरसने लगें। तब माधव चली। उसके नेत्रों में प्रेम की झलक थी और मुंह पर प्रेम की लाली। अधरों पर महिनी मुस्कान झलक रही थी और मन प्रेमोन्माद में मग्न था। उसने बालाजी की ओर ऐसी चितवन से देखा जो अपार प्रेम से भरी हुई। तब सिर नीचा करके फूलों की जयमाला उसके गले में डाली। ललाट पर चन्दन का तिलक लगाया। लोक–संस्कारकी न्यूनता, वह भी पूरी हो गयी। उस समय बालाजी ने गम्भीर सॉस ली। उन्हें प्रतीत हुआ कि मैं अपार प्रेम के समुद्र में वहां जा रहा हूं। धैर्य का लंगर उठ गया और उसे मनुष्य की भांति जो अकस्मात् जल में फिसल पडा हो, उन्होंने माधवी  की बांह पकड़ ली। परन्तु हां :जिस तिनके का उन्होंने सहारा लिया वह स्वयं  प्रेम की धार में तीब्र गति से बहा जा रहा था। उनका हाथ पकडते ही माधवी  के रोम-रोम में बिजली दौड गयी। शरीर में स्वेद-बिन्दु झलकने लगे और जिस प्रकार वायु के झोंके से पुष्पदल पर पड़े हुए ओस के जलकण पृथ्वी पर गिर जाते हैं, उसी प्रकार माधवी के नेत्रों से अश्रु के बिन्दु बालाजी के हाथ पर टपक पड़े। प्रेम के मोती थें, जो उन मतवाली आंखों ने बालाजी को भेंट किये। आज से ये ओंखें फिर न रोयेंगी।
आकाश पर तारे छिटके हुए थे और उनकी आड़ में बैठी हुई स्त्रियां  यह दृश्य देख रही थी आज प्रात:काल बालाजी के स्वागत में यह गीत गाया था :
बालाजी तेरा आना मुबारक होवे।
और इस समय  स्त्रियां  अपने मन –भावे स्वरों से गा रहीं हैं :
बालाजी तेरा आना मुबारक होवे।
आना भी मुबारक था और जाना भी मुबारक हैं। आने के समय भी लोगों की आंखों से आंसूं निकले थें और जाने के समय भी निकल रहें हैं। कल वे नवागत के  अतिथि स्वागत के लिए आये  थें। आज उसकी विदाई कर रहें हैं उनके रंग – रुप सब पूर्ववत है :परन्तु उनमें कितना अन्तर हैं।

 

 

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