मुंशी प्रेमचंद - निर्मला

premchand nirmla premchand hindi novel

निर्मला

इक्कीस

पेज- 69

 पांच-छ: दिन तक जियाराम ने पेट भर भोजन नहीं किया। कभी दो-चार कौर खा लेता, कभी कह देता, भूख नहीं है। उसके चेहरे का रंग उड़ा रहता था। रातें जागतें कटतीं, प्रतिक्षण थानेदार की शंका बनी रहती थी। यदि वह जानता कि मामला इतना तूल खींचेंगा, तो कभी ऐसा काम न करता। उसने तो समझा था- किसी चोर पर शुबहा होगा। मेरी तरफ किसी का ध्यान भी न जायेगा, पर अब भण्डा फूटता हुआ मालूम होता था। अभागा थानेदार जिस ढंगे से छान-बीन कर रहा था, उससे जियाराम को बड़ी शंका हो रही थी।
सातवें दिन संध्या समय घर लौटा तो बहुत चिन्तित था। आज तक उसे बचने की कुछ-न-कुछ आशा थी। माल अभी तक कहीं बरामद न हुआ था, पर आज उसे माल के बरामद होने की खबर मिल गयी थी। इसी दम थानेदार कांस्टेबिल के लिए आता होगा। बचने को कोई उपाय नहीं। थानेदार को रिश्वत देने से सम्भव है मुकदमे को दबा दे, रुपये हाथ में थे, पर क्या बात छिपी रहेगी? अभी माल बरामद नही हुआ, फिर भी सारे शहर में अफवाह थी कि बेटे ने ही माल उड़ाया है। माल मिल जाने पर तो गली-गली बात फैल जायेगी। फिर वह किसी को मुंह न दिखा सकेगा।
मुंशीजी कचहरी से लौटे तो बहुत घबराये हुए थे। सिर थामकर चारपाई पर बैठ गये।
निर्मला ने कहा- कपड़े क्यों नहीं उतारते? आज तो और दिनों से देर हो गयी है।
मुंशीजी- क्या कपडे ऊतारुं? तुमने कुछ सुना?
निर्मला- क्य बात है? मैंने तो कुछ नहीं सुना?
मुंशीजी- माल बरामद हो गया। अब जिया का बचना मुश्किल है।
निर्मला को आश्चर्य नहीं हुआ। उसके चेहरे से ऐसा जान पड़ा, मानो उसे यह बात मालूम थी। बोली- मैं तो पहले ही कर रही थी कि थाने में इत्तला मत कीजिए।
मुंशीजी- तुम्हें जिया पर शका था?
निर्मला- शक क्यों नहीं था, मैंने उन्हें अपने कमरे से निकलते देखा था।
मुंशीजी- फिर तुमने मुझसे क्यों न कह दिया?
निर्मला- यह बात मेरे कहने की न थी। आपके दिल में जरुर खयाल आता कि यह ईर्ष्यावश आक्षेप लगा रही है। कहिए, यह खयाल होता या नहीं? झूठ न बोलिएगा।
मुंशीजी- सम्भव है, मैं इन्कार नहीं कर सकता। फिर भी उसक दशा में तुम्हें मुझसे कह देना चाहिए था। रिपोर्ट की नौबत न आती। तुमने अपनी नेकनामी की तो- फिक्र की, पर यह न सोचा कि परिणाम क्या होगा? मैं अभी थाने में चला आता हूं। अलायार खां आता ही होगा!
निर्मला ने हताश होकर पूछा- फिर अब?
मुंशीजी ने आकाश की ओर ताकते हुए कहा- फिर जैसी भगवान् की इच्छा। हजार-दो हजार रुपये रिश्वत देने के लिए होते तो शायद मामेला दब जाता, पर मेरी हालत तो तुम जानती हो। तकदीर खोटी है और कुछ नहीं। पाप तो मैंने किया है, दण्ड कौन भोगेगा? एक लड़का था, उसकी वह दशा हुई, दूसरे की यह दशा हो रही है। नालायक था, गुस्ताख था, गुस्ताख था, कामचोर था, पर था ता अपना ही लड़का, कभी-न-कभी चेत ही जाता। यह चोट अब न सही जायेगी।
निर्मला- अगर कुछ दे-दिलाकर जान बच सके, तो मैं रुपये का प्रबन्ध कर दूं।
मुंशीजी- कर सकती हो? कितने रुपये दे सकती हो?
निर्मला- कितना दरकार होगा?
मुंशीजी- एक हजार से कम तो शायद बातचीत न हो सके। मैंने एक मुकदमे में उससे एक हजार लिए थे। वह कसर आज निकालेगा।
निर्मला- हो जायेगा। अभी थाने जाइए।
मुंशीजी को थाने में बड़ी देर लगी। एकान्त में बातचीत करने का बहुत देर मे मौका मिला। अलायार खां पुराना घाघ थ। बड़ी मुश्किल से अण्टी पर चढ़ा। पांच सौ रुवये लेकर भी अहसान का बोझा सिर पर लाद ही दिया। काम हो गया। लौटकर निर्मला से बोला- लो भाई, बाजी मार ली, रुपये तुमने दिये, पर काम मेरी जबान ही ने किया। बड़ी-बड़ी मुश्किलों से राजी हो गया। यह भी याद रहेगी। जियाराम भोजन कर चुका है?
निर्मला- कहां, वह तो अभी घूमकर लौटे ही नहीं।
मुंशीजी- बारह तो बज रहे होंगें।
निर्मला- कई दफे जा-जाकर देख आयी। कमरे में अंधेरा पड़ा हुआ है।
मुंशीजी- और सियाराम?
निर्मला- वह तो खा-पीकर सोये हैं।
मुंशीजी- उससे पूछा नहीं, जिया कहां गया?
निर्मला- वह तो कहते हैं, मुझसे कुछ कहकर नहीं गये।
मुंशीजी को कुछ शंका हुई। सियाराम को जगाकर पूछा- तुमसे जियाराम ने कुछ कहा नहीं, कब तक लौटेगा? गया कहां है?
सियाराम ने सिर खुजलाते और आंखों मलते हुए कहा- मुझसे कुछ नहीं कहा।
मुंशीजी- कपड़े सब पहनकर गया है?
सियाराम- जी नहीं, कुर्ता और धोती।
मुंशीजी- जाते वक्त खुश था?
सियाराम- खुश तो नहीं मालूम होते थे। कई बार अन्दर आने का इरादा किया, पर देहरी से ही लौट गये। कई मिनट तक सायबान में खड़े रहे। चलने लगे, तो आंखें पोंछ रहे थे। इधर कई दिन से अक्सा रोया करते थे।
मुंशीजी ने ऐसी ठंडी सांस ली, मानो जीवन में अब कुछ नहीं रहा और निर्मला से बोले- तुमने किया तो अपनी समझ में भले ही के लिए, पर कोई शत्रु भी मुझ पर इससे कठारे आघात न कर सकता था। जियाराम की माता होती, तो क्या वह यह संकोच करती? कदापि नहीं।
निर्मला बोली- जरा डॉक्टर साहब के यहां क्यों नहीं चले जाते? शायद वहां बैठे हों। कई लड़के रोज आते है, उनसे पूछिए, शायद कुछ पता लग जाये। फूंक-फूंककर चलने पर भी अपयश लग ही गया।
मुंशीजी ने मानो खुली हुई खिड़की से कहा- हां, जाता हूं और क्या करुंगा।
मुंशीज बाहर आये तो देखा, डॉक्टर सिन्हा खड़े हैं। चौंककर पूछा- क्या आप देर से खड़े हैं?
डॉक्टर- जी नहीं, अभी आया हूं। आप इस वक्त कहां जा रहे हैं? साढ़े बारह हो गये हैं।
मुंशीजी- आप ही की तरफ आ रहा था। जियाराम अभी तक घूमकर नहीं आया। आपकी तरफ तो नहीं गया था?
डॉक्टर सिन्हा ने मुंशीजी के दोनों हाथ पकड़ लिए और इतना कह पाये थे, ‘भाई साहब, अब धैर्य से काम..’ कि मुंशीजी गोली खाये हुए मनुष्य की भांति जमीन पर गिर पड़े।

 

 

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