हिन्दी के कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-1885 ई.) आधुनिक हिंदी साहित्य के जन्मदाता, बहुमुखी प्रतिभा के धनी हरिश्चंद्र का जन्म काशी के इतिहास-प्रसिध्द अमीचंद जगत सेठ के प्रसिध्द परिवार में हुआ। पिता गोपालचंद्र स्वयं कवि थे। हरिश्चंद्र भी बचपन से ही कविता करने लगे। स्वाध्याय से ही हिंदी, गुजराती, मराठी, राजस्थानी, बंगला, उर्दू तथा अंग्रेजी सीखी । ये 35 वर्ष की अल्पायु में ही स्वर्गवासी हो गए। हरिश्चंद्र अपने देश-प्रेम, साहित्य-प्रेम तथा ईश्वर-प्रेम के लिए प्रसिध्द हैं। इन्होंने प्रुचर साहित्य-सेवा की। इनके 175 ग्रंथ बताए जाते हैं, जिनमें 69 उपलब्ध है। मौलिक नाटक 'सत्य-हरिश्चंद्र 'भारत-दुर्दशा 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति आदि हैं। इन्होंने अनेक उपन्यास और लेख लिखे और प्रचुर संपादन कार्य भी किया। 'कवि वचन सुधा, 'हरिश्चंद्र मैगेजीन तथा स्त्रियों के लिए ' बालबोधिनी पत्रिकाएं निकालीं। ब्रजभाषा तथा खडी बोली दोनों में कविता लिखी। परंपरागत कविता संग्रह हैं- 'भक्ति-सर्वस्व, 'प्रबोधिनी, 'प्रेम-सरोवर, 'सतसई-शृंगार आदि तथा अन्य अनेक नवीन काव्य कृतियां हैं- 'सुमनांजलि, 'सुंदरी-तिलक तथा 'पावस कवित्त संग्रह आदि जिनमें देश-भक्ति तथा समाज-सुधार संबंधी कविताएं हैं। इन्होंने अनेक प्रकार से खडी बोली का प्रचार और प्रसार किया। 1880 में काशी की विद्वन्मंडली ने इन्हें 'भारतेंदु की उपाधि से विभूषित किया। पद मन की कासों पीर सुनाऊं। हम सब जानति लोक की चालनि, क्यौं इतनौ बतरावति हौ अमृत से जुग ओठ लसैं, नव पल्लव सो कर क्यों है सुहायो। गंगा-वर्णन नव उज्ज्वल जलधार हार हीरक सी सोहति। लोल लहर लहि पवन एक पै इक इम आवत । सुभग स्वर्ग-सोपान सरिस सबके मन भावत। श्रीहरि-पद-नख-चंद्रकांत-मनि-द्रवित सुधारस। शिवसिर-मालति-माल भगीरथ नृपति-पुण्य-फल। सगर-सुवन सठ सहस परस जल मात्र उधारन। यमुना-वर्णन तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये। किधौं मुकुर मैं लखत उझकि सब निज-निज सोभा। मनु आतप वारन तीर को, सिमिट सबै छाये रहत। कं तीर पर अमल कमल सोभित बहु भांतिन। मनु दृग धारि अनेक जमुन निरखत निज सोभा। कै करिके कर बहु पीय को, टेरत निज ढिंग सोहई।
|