मोहनदास करमचंद गाँधी की आत्मकथा

सत्य के प्रयोग

पाँचवा भाग

पंजाब में

 

पंजाब मे जो कुछ हुआ उसके लिए अगर सर माइकल ओडवायर ने मुझे गुनहगार ठहराया , तो वहाँ के कोई कोई नवयुवक फौजी कानून के लिए भी मुझे गुनहगार ठहराने मे हिचकिचाते न थे । क्रोधावेश मे भरे इन नवयुवको की दलील यह थी कि यदि मैने सविनय कानून-भंग को मुलतवी न किया होता, तो जलियावाला बाद का कत्लेआम कभी न होता और न फौजी कानून ही जारी हुआ होता । किसी-किसी ने तो यह धमकी भी दी थी कि मेरे पंजाब जाने पर लोग मुझे जान से मारे बिना न रहेंगे ।

किन्तु मुझे तो अपना कदम उपयुक्त मालूम होता था कि उसके कारण समझदार आदमियो मे गलतफहमी होने की सम्भावना ही न थी । मै पंजाब जाने के लिए अधीर हो रहा था । मैने पंजाब कभी देखा न था । अपनी आँखो से जो कुछ देखने को मिले, उसे देखने की मेरी तीव्र इच्छा थी, और मुझे बुलानेवाले डॉ. सत्यपाल, डॉ. किचलू तथा प. रामभजदत्त चौधरी को मै देखना चाहता था । वे जेल मे थे । पर मुझे पूरा विश्वास था कि सरकार उन्हें लम्बे समय तक जेल मे रख ही नही सकेगी । मै जब-जब बम्बई जाता तब-तब बहुत से पंजाबी मुझ से आकर मिला करते थे । मै उन्हें प्रोत्साहन देता था , जिसे पाकर वे प्रसन्न होते थे । इस समय मुझमे विपुल आत्मविश्वास था ।

लेकिन मेरा जाना टलता जाता था । वाइसरॉय लिखते रहते थे कि 'अभी जरा देर है ।'

इसी बीच हंटर-कमेटी आयी । उसे फौजी कानून के दिनो मे पंजाब के अधिकारियो द्वारा किये गये कारनामो की जाँच करनी थी । दीनबन्धु एंड्रूज वहाँ पहुँच गये थे । उनके पत्रो मे हृदयद्रावक वर्णन होते थे । उनके पत्रो की ध्वनि यह थी कि अखबारो मे जो कुछ छपता था, फौजी कानून का जुल्म उससे कही अधिक था । पत्रो मे मुझे पंजाब पहुँचने का आग्रह किया गया । दूसरी तरफ मालवीयजी के भी तार आ रहे थे कि मुझे पंजाब पहुँचना चाहिये । इस पर मैने वाइसरॉय को फिर तार दिया ।

उत्तर मिला, 'आप फलाँ तारीख को जा सकते है ।' मुझे तारीख ठीक याद नही है , पर बहुत करके वह 16 अक्तूबर थी ।

लाहौर पहुँचने पर जो दृश्य मैने देखा, वह कभी भुलाया नही जा सकता । स्टेशन पर लोगो का समुदाय इस कदर इकट्ठा हुआ था, मानो बरसो के बिछोह के बाद कोई प्रियजन आ रहा हो और सगे-संबंधी उससे मिलने आये हो । लोग हर्षोन्मत्त हो गये थे ।

मुझे प. राजभजदत्त चौधरी के घर ठहराया गया था । श्री सरलादेवी चौधरानी पर, जिन्हें मै पहले से ही जानता था , मेरी आवभगत का बोझ आ पड़ा था । आवभगत का बोझ शब्द मै जानबूझकर लिख रहा हूँ, क्योकि आजकल की तरह इस समय भी जहाँ मै ठहरता था, वहाँ मकान-मालिक का मकान धर्मशाला -सा हो जाता था ।

पंजाब मे मैने देखा कि बहुत से पंजाबी नेताओ के जेल मे होने के कारण मुख्य नेताओ का स्थान पं. मालवीयजी, पं. मोतीलालजी और स्व. स्वामी श्रद्धानन्दजी ने ले रखा था । मालवीयजी और श्रद्धानन्द के सम्पर्क मे तो मै भलीभाँति आ चुका था , पर पं. मोतीलालजी के सम्पर्क मे तो मै लाहौर मे ही आया । इन नेताओ ने और स्थानीय नेताओ ने, जिन्हें जेल जाने का सम्मान नही मिला था, मुझे तुरन्त अपना बना लिया । मै कहीं भी अपरिचित-सा नही जान पड़ा ।

हंटर कमेटी के सामने गवाही न देने का निश्चय हम सब ने सर्वसम्मति से किया । इसके सब कारण प्रकाशित कर दिये गये थे । इसलिए यहाँ मै उनकी चर्चा नही करता । आज भी मेरी यह ख्याल है कि वे कारण सबल थे और कमेटी का बहिष्कार उचित था ।

पर यह निश्चय हुआ कि यदि हंटर कमेटी का बहिस्कार किया जाये , तो जनता की ओर से अर्थात कांग्रेस की और से एक कमेटी होनी चाहिये । पं. मालवीय, पं. मोतीलाल नेहरू, स्व. चितरंजनदास, श्री अब्बास तैयबजी और श्री जयकर को तथा मुझे इस कमेटी मे रखा गया । हम जाँच के लिए अलग अलग स्थानो पर बँट गये । इस कमेटी का व्यवस्था का भार सहज ही मुझ पर आ पड़ा था , और चूंकि अधिक-से-अधिक गाँवो की जाँच का काम मेरे हिस्से ही आया था, इसलिए मुझे पंजाब और पंजाब के गाँव देखने का अलभ्य लाभ मिला ।

इस जाँच के दौरान मे पंजाब की स्त्रियो से तो मै इस तरह से मिला, मानो मै उन्हें युगे से पहचानता होऊँ । जहाँ जाता वहाँ दल-के-दल मुझसे मिलते और वे मेरे सामने अपने काते हुए सूत का ढेर लगा देती थी । इस जाँच के सिलसिलो मे अनायास ही मै देख सका कि पंजाब खादी का महान क्षेत्र हो सकता है ।

लोगो पर ढाये गये जुल्मो की जाँच करते हुए जैसे-जैसे मै गहराई मे जाने लगा , वैसे-वैसे सरकारी अराजकता की , अधिकारियो की नादिरशाही और निरंकुशता की अपनी कल्पना से परे की बाते सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ और मैने दुःख का अनुभव किया । जिस पंजाब से सरकार को अधिक से अधिक सिपाही मिलते है, इस पंजाब मे लोग इतना ज्यादा जुल्म कैसे सहन कर सके, यह बात मुझे उस समय भी आश्चर्यजनक मालूम हुई थी और आज भी मालूम होती है ।

इस कमेटी की रिपोर्ट तैयार करने का काम भी मुझे ही सौपा गया था । जो यह जानना चाहते है कि पंजाब मे किस तरह के जुल्म हुए थे , उन्हे यह रिपोर्ट अवश्य पढनी चाहिये । इस रिपोर्ट के बारे मे इतना मै कह सकता हूँ कि उसमे जान-बूझकर एक भी जगह अतिशयोक्ति नही हुई है । जितनी हकीकते दी गयी है, उनके लिए उसी मे प्रमाण भी प्रस्तुत किये गये है । इस रिपोर्ट मे जितने प्रमाण दिये गये है , उनसे अधिक प्रमाण कमेटी के पास मौजूद थे । जिसके विषय मे तनिक भी शंका थी, ऐसी एक भी बात रिपोर्ट मे नही दी गयी । इस तरह केवल सत्य को ही ध्यान मे रखकर लिखी हुई रिपोर्ट से पाठक देख सकेंगे कि ब्रिटिशा राज्य अपनी सत्ता के ढृढ बनाये रखने के लिए किस हद तक जा सकता है , कैसे अमानुषिक काम कर सकता है । जहाँ तक मै जानता हूँ, इस रिपोर्ट की एक भी बात आज तक झूठ साबित नही हुई ।

 

 

 

 

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