Dr Amit Kumar Sharma

शैव सम्प्रदाय में मूर्तिपूजा

लेखक

डा० अमित कुमार शर्मा

समाजशास्त्र विभाग,

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली - 110067

शैव सम्प्रदाय में मूर्तिपूजा

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मूर्तिपूजा में दृश्य से अदृश्य की पूजा होती है। जिस तरह वैष्णवों की दृष्टि में शालग्राम में विष्णु की भावना होती है। केवल काष्ठ, पाषाण, धातु की पूजा नहीं होती, बल्कि मन्त्र और विधानों की महिमा से आहूत संनिहित व्यापक देवतत्त्व ही मूर्ति में आराध्य होता हैं । व्यष्टि के द्वारा ही प्राणियों के मन में समष्टि भाव का आरोहण होता है। उसी तरह शैव सम्प्रदाय में व्यष्टि प्रजनन शक्तियों में व्याप्त शिवतत्त्व का समष्टिस्वरूप शिवलिंग है। समष्टि शिवमूर्ति की ही उपासना और प्रतिमा होती है। तम से ही सबका उद्भव और उसी में सबका लय होता है। तम को वश में रखकर उसके अधिष्ठाता शिव ही सर्वकारण हैं।

समस्त योनियों का समष्टि रूप प्रकृति है, वही शिव लिंग का पीठ या जलहरी है। योनि में प्रतिष्ठित लिंग आनन्दप्रधान, आनन्दमय होता है। अतएव प्रकृति विशिष्ट दृक् रूप परमात्मा आनन्दमय कहलाता है। उसी की प्रतिकृति पाषाणमयी, धातुमयी, जलहरी और लिंगरूप में बनायी जाती है। श्रुतियों एवं पुराणों में आध्यात्मिक, आधिदैविक तत्वों का ही लौकिक भाषा में वर्णन किया जाता है। गोलोकधाम में एक पूर्णतम पुरूषोत्तम श्रीकृष्ण ने अकेले अरमन के कारण अपने आपको दो रूप में प्रकट किया ---एक श्याम तेज, दूसरा गौर तेज। गौर तेज राधिका में श्यामल तेज कृष्ण से गर्भाधान होने पर महत्ता तत्वप्रधान हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुए।

जाग्रत्, स्वप्न के अभिमानी विश्व, तैजस और विराट्, हिरष्यगर्भ ये सभी सावयव हैं। किन्तु सर्व - लयाधिकरण ईश्वर निरवयव है, वह माया से आवृत्ता होता है। अविद्या के भीतर ही रहने वाला तो जीव है, परन्तु जो अविद्या का अतिक्रमण कर स्थित है, वही ईश्वर है। निरावरण तत्व शिव है। ईश्वर भाव माया से आवृत और शिव भाव अनावृत है। माया जलहरी है और उसके भीतर आवृत ईश्वर है। जलहरी के बाहर निकला हुआ शिवलिंग निरावरण ईश्वर है। लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु ऊपर प्रणवात्मक शकंर है। लिंग महेश्वर, अर्घा महादेवी हैं। अर्घा गोल नहीं, दीर्घ होता है। शिव के सम्बन्ध मात्र से प्रकृति स्वयं विकाररूप में प्रवाहित होती है। चैतन्य रूप लिंग सत्ता और प्रकृति से ही ब्रह्मांड बना। उनके सहारे ही वह लय की और जा सकेगा।

प्रणव में अकार शिवलिंग है, उकार जलहरी है, मकार शिवशक्ति का सम्मिलित रूप है। शिवब्रहम का स्थूल आकार विराट ब्रह्मांड है, ब्रह्मांड आकार का ही शिवलिंग होता है। निर्गुण ब्रहम का बोधक होने से यही ब्रह्मांड लिंग है।
उकार से जलहरी, अकार से पिण्डी और मकार से त्रिगुणात्मक त्रिपुण्ड कहा गया है। सर्वरूप, पूर्ण एवं निराकार का आकार अण्ड के आकार का ही होता है। आत्मा से आकाश की उत्पत्ति है, यही निराकार का ज्ञापक लिंग उसका स्थूल शरीर है। पचंतत्वात्मिका प्रकृति उसकी पीठिका है। पहले कुछ भी नहीं था, केवल शिव थे। फिर सूर्य के समान परम तेजोमय (ज्योतिलिंग) अण्ड उत्पन्न हुआ। पचांत्क्षर उसका स्थूल रूप है। माघ कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि के दिन कोटिसूर्य समान परम तेजोमय शिवलिंग का प्रादुर्भाव हुआ।

एक शिव ही ब्रहमस्वरूप होने से निष्कल हैं, दूसरे देव सभी रूपी होने से सकल कहे जाते हैं। शिव सकल और निष्कल दोनों ही हैं। अत: उनका निराकार लिंग और साकार स्वरूप दोनों ही पूज्य होते हैं। दूसरे देवता साक्षात् निष्कल ब्रहमरूप नहीं हैं, अतएव निराकार लिंगरूप में उनकी आराधना नहीं होती। शिवलिंग ही से समस्त विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और अंत में सबका उन्हीं में लय होता है। सब सृष्टि का आधार ही शिव लिंग है।

कूटस्थ एथाणु पर ब्रहम ही शिव हैं। स्थाणु (ठँठ) लिंगरूप में व्यक्त शिव है, अपर्णा जलहरी है। शुद्ध शिवतत्व त्रिगुणातीत है। त्रिमूर्ति के अंतर्गत शिव परम बीज, तमोगुण के नियामक हैं। सत्व के नियमन की अपेक्षा तम का नियमन बहुत कठिन है। सर्वसंहारक तम है। शिव ही तम को वश में रखते हैं। अव्यक्त तत्व लिंग है। माया द्वारा एक ही परब्रह्म परमात्मा से ब्रह्मांडरूप लिंग का प्रादुर्भाव होता है। चौबीस प्रकृति - विकृति, पचीसवां पुरूष, छबीसवां ईश्वर यह सब कुछ लिंग ही है। उसी से ब्रहमा, विष्णु, रूद्र का आविर्भाव होता है। प्रकृति से सत्व, रज, तम इन तीन गुणों से त्रिकोण योनि बनती है। प्रकृति में स्थित निर्विकार बोधरूप शिव तत्व ही लिंग है। इसी को विश्व - तेजस - प्राज्ञ, विराट हिरण्यगर्म - वैश्वानर, जाग्रत - स्वप्न - सुषुप्ति, वहक् - साम - यजु, परा - पश्यंति - मध्यमा आदि त्रिकोणपीठों में तुरीय, प्रणव, परा वाक् स्वरूप लिंगरूप में समझना चाहिए। ''अउम '' इस प्रणवात्मक त्रिकोण में अर्ध्दमात्रास्वरूप लिंग है।

लिंग - भग से ही समस्त विश्व की उत्पत्ति है। शकंर ने काम को जलाकर सृष्टि की बुध्दि से ही मैथुन द्वारा सृष्टि की है। सृष्टि से पहले ज्ञान और अर्थ (दृश्य)   एकमेव हो रहे थे। दृश्य शक्ति के उद्भव बिना चिदात्मा भी अपने को असत् ही मानने लगता है। शिव ही शक्ति और शक्ति ही शिव हैं। इस द्वैत में अद्वैत तत्व अनुस्यूत है। योनि त्रिकोण है, केन्द्र या मध्यबिन्दु लिंग है।
इच्छा - ज्ञान - क्रिया = योनि = त्रिक           
मूलाधार आदि षटचक्र भी योनि ही है। लिंग भी सर्वत्र भिन्न - भिन्न रूप में विराजमान है। योनि से अतीत होकर बिन्दु अव्यक्त और लिंग अलिंग हो जाता है कोई गुण, कर्म, द्रव्य बिना योनि - लिंग के नहीं बन सकते। याज्ञिकों के यहां भी वेदी की स्त्री रूप में, कुण्ड की योनि रूप में उपासना होती है। आद्याशक्ति साढ़ेतीन फेरे की कुण्डलिनी रूप है। वह शिवतत्व को अपने साढ़ेतीन फेरे से वेष्टित किए हुए है। उसी शक्ति के संयोग से शिव अनन्त ब्रह्मांड का उत्पादनादि कार्य करते हैं। वही कुण्डलिनी योनि है। पृथ्वी पीठ और आकाश लिंग है।

योनि = दिव्य प्रकृति, लिंग = परम पुरूष बिन्दु देवी और नाद शिव है। समस्त पीठ अम्बामय है, लिंग चिन्मय है। संसार का मूल कारण महाचैतन्य है और लोक लिड्.गात्मक है। ब्रह्मांड की आकृति ही शिवलिंग है। शिव स्वयं अलिंग हैं, उनसे लिंग की उत्पत्ति होती हैं शिव लिंगी और शिवा लिंग हैं। रूद्र एक मात्र स्वामी, अतीन्द्रियार्थ ज्ञानी और हिरण्यगर्म को उत्पन्न करने वाले हैं। वे अग्नि में, जल में, औषधि एवं वनस्पतियों में रहते हैं। वे सबका निर्माता हैं। रूद्र से भिन्न दूसरा तत्व ही नहीं है।

तम को ही सबका आदि और कारण कहा गया है। उसी में वैषम्य होने से सत्व, रज का उद्भव होता है। भगवान तम के नियंता हैं, वे तामस नहीं हैं। शिव से भिन्न जो कुछ भी है, उन सबके संहारक शिव हैं। इसीलिए विष्णु को उनका स्वरूप ही माना जाता है। भगवान् रसस्वरूप हैं। भगवान से ही समस्त विश्व को आनंद प्राप्त होता है।

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