Dr Amit Kumar Sharma

समकालीन भारतीय समाज और महात्मा गांधी

लेखक

डा० अमित कुमार शर्मा

समाजशास्त्र विभाग,

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली - 110067

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समकालीन भारतीय समाज और महात्मा गांधी

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15 अगस्त 1947 से करीब- करीब 1990-91 तक भारतीय राज्य व्यवस्था पर नेहरू जी का प्रभाव महात्मा गांधी की तुलना में ज्यादा रहा। देश को बंटवारे के बाद सर्शत स्वतंत्रता मिली थी। कांग्रेस के हिन्दू नेतृत्व (जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, वी. के. कृष्णमेनन और तेजबहादुर सप्तु आदि) को अंग्रेजों ने समझाया कि यदि देश का बंटवारा नहीं होता है तो स्वतंत्र भारत में प्रजातांत्रिक रूप से हमेशा मुस्लिम शासन रहेगा। वे हरिजनों के एक वर्ग (दलितों) को अपने साथ मिला लेंगे, जातियों में बंटा हिन्दू समाज हमेशा गुलाम बना रहेगा। अत: मुस्लिम लीग के बंटवारा का प्रस्ताव भारत के हिन्दुओं के लिए स्वर्ण अवसर है। गांधी ''सठिया'' गए हैं। उनको अपना सभ्यता मूलक राग अलापने दो। तुम लोग अपना और हिन्दू समाज का हित देखो। गांधी बंटवारे की कीमत पर स्वतंत्रता नहीं चाहते थे। वे दक्षिण अफ़्रीका के सत्याग्रह आंदोलन के दिनों से ही (1906 से) हिन्दू-मुस्लिम एकता को जरूरी मानते थे। 1909 में लिखे हिन्द स्वराज नामक अपनी बुनियादी दस्तावेज में उन्होंने केवल एक अधिकारी विद्वान को उध्दृत किया था, इस्लाम धर्म के पैगम्बर मुहम्मद को। वे पैगम्बर मुहम्मद को पारम्परिक सभ्यता के प्रतीक पुरूष के रूप में 1909 में याद कर रहे थे। 1915 के अंत में भारत आने के बाद उन्होंने खिलाफत आंदोलन में न सिर्फ भाग लिया था बल्कि वे हिन्दू- मुस्लिम एकता के जबर्दस्त हिमायती थे। वे ताल ठोक कर कहते थे कि ''सबसे पहले मै सनातनी हिन्दू हूँ और एक हिन्दू के रूप में मेरा सबसे प्रमुख कर्त्तव्य है छुआछूत मिटाना। उसके बाद मै एक भारतीय हूँ और भारतीय के रूप में मेरा सबसे प्रमुख कर्त्तव्य है हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करना। अंत में मै एक मनुष्य  हूँ और एक मनुष्य के रूप में मेरा कर्त्तव्य है अपने पड़ोसी की सेवा करना।'' जवाहर लाल नेहरू जैसे पश्चिम परस्त हिन्दुओं को तथा समकालीन भारत के अकादमिक रूप से सक्षम बुध्दिजीवियों के लिए गांधी जी की उपरोक्त बातों को समझना जिन्दा सांप निगलने जैसा रहा है। असल में अंग्रेजी राज में धर्म परिवर्तन की घटना मध्यकाल की तुलना में भले ही कम हुआ हो लेकिन विचार परिवर्तन की घटना बड़ी तेजी से घटी है। भारत के अंग्रेजीदां लोगों के बीच महात्मा गांधी का सनातन हिन्दू धर्म और उनका हिन्द स्वराज हमेशा से अग्राह्य रहा है। दूसरी ओर वे लोग अंग्रेजी शासन के कुप्रचार के कारण ''आधुनिक मानवबाद'' को बहुत अच्छी चीज मानते रहे हैं। असल में अंग्रेजीराज जिस उपनिवेवादी मानसिकता पर आधारित था उसका आधार 18 वीं शताब्दी के यूरोपीय ज्ञानोदय में निहित है। यह ज्ञानोदय मनुष्य के मस्तिष्क और तर्कशक्ति को ईश्वर से भी शक्तिशाली और स्वयंभू मानता है। इसका मूल वाक्य है ''मैन इज दि मेजर ऑफ एवरिथिंग एल्स'' यानि ईश्वर, प्रकृति, मनुष्येतर जीव - जन्तु सबका मूल्यांकण मनुष्य के बनाये कृत्रिम मानदंडों पर ही हो सकता है। और जैसा कि सर्वविदित है, 18 वीं शताब्दी के ज्ञानोदय का मानदंड था - अस्तित्व के लिए संघर्ष करना, सर्वश्रेष्ठ का जीतना एवं बचा रहना तथा वीर भोग्या वसुन्धरा। इस ज्ञानोदय की मान्यता थी कि मनुष्य समाज - असभ्य, बर्बर और सभ्य तीन अवस्थाओं से गुजरता है। इन अवस्थाओं में वह अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता हुआ सभ्य समाज के रूप में जीतता है। अंग्रेज शासक तो खुले आम कहते थे कि वे अपने उपनिवेशों की असभ्य एवं बर्बर आबादी को सभ्य बनाते हैं। यह गोरे लोगों का दायित्व है कि वे असभ्य एवं बर्बर काले और भूरे लोगों को सभ्य बनायें। वे यह भी मानते थे कि केवल ईसाई धर्म सभ्य लोगों का धर्म है। यहूदी और मुसलमान बर्बर लोगों के धर्म हैं तथा अन्य सभी धर्मावलंबी असभ्य परम्परा के वाहक हैं। बिना इस संदर्भ को ध्यान में रखे हुए आप गांधी जी के उपरोक्त कथन को ठीक से नहीं समझ सकते। गांधी जी जब यह कहते हैं कि वे सबसे पहले सनातनी हिन्दू हैं तो वे यह कह रहे थे कि मेरी नजर में हिन्दू धर्म भी  एक सभ्य धर्म है और इसकी प्रमुख खराबी छुआछूत की भावना है। साथ ही वह यह भी कह रहे थे कि हिन्दू धर्म में अधिकार की भावना की तुलना मेरा कर्त्तव्य की भावना प्रमुख है। जब वे यह कह रहे थे कि दूसरे स्तर पर मैं एक भारतीय हँ तो वे यह कह रहे थे कि भारत एक प्राचीन सभ्यता है और काल - क्रम में इसमें हिन्दू - मुसलमान साथ - साथ रहते आये हैं। इनके बीच में एकता पैदा करके सभ्यतामूलक जीवन पध्दति बनाये रखना मेरा दूसरा प्रमुख कर्त्तव्य है। इस बात में यह अपने आप निहित है कि भारतीय सभ्यता एक भू - सांस्कृतिक अवधारणा है और अनेकता में एकता स्थापित करना हर भारतीय का कर्त्तव्य है। अंत में गांधी जी कहते हैं कि वे अपने पड़ोसी की सेवा करें। यह पड़ोसी मनुष्य भी हो सकता है, मनुष्येतर जीव - जन्तु भी, प्रकृति भी हो सकती है और दैवीय शक्ति भी। सनातन धर्म की जिस धारा से गांधीजी ने खुद को जोड़ा था उसमें सम्पूर्ण जगत ईश्वर के शरीर का विस्तार है और सम्पूर्ण संसार उनकी लीला का एक स्वरूप। मनुष्य 84 लाख योनियों में मात्र एक योनि है और ईश्वरीय लीला का एक खिलौना मात्र है। एक खिलौने का कर्त्तव्य है कि वह एक जीव के रूप में अपनी हद को नहीं लांघे। कोई भी जीव अपने हाथ - पैर - शरीर से केवल अपने आस-पास के जीवों या पड़ोसियों की ही सेवा कर सकता है। हां, अपने अहंकार में वह सारी दुनिया की सेवा करने का दंभ अवश्य पाल सकता है। लेकिन अगर वह अपनी सेवा के  स्वरूप पर निरपेक्ष मीमांसा करे तो उसको समझ में आएगा कि जाने - अनजाने वह सेवा के बदले शोषण करता रहा है। रक्षा के बदले हत्या करता रहा है। शक्ति देने के बदले शक्तिहीन बनाता रहा है। प्रगति के नाम पर विनाश करता रहा है। गांधी जी यह भी कहा करते थे कि सच्ची सभ्यता तो सर्वोदय पर टिकी होती है। जिस सभ्यता में एक भी आदमी दुखी हो वह सभ्यता में सफलता सत्य, सुन्दर और कल्याणकारी तत्वों से विमुख हो वह सफलता सफलता नहीं कही जा सकती। सत्य ईश्वर का दूसरा नाम है। सत्य यथार्थ और संभावनाओं के जोड़ का भी नाम है। हर जीव एक यथार्थ है लेकिन उसमें ईश्वर बनने की संभावना है। यथार्थ जीव को ईश्वर बनाने के तीन मार्ग हैं - कर्म मार्ग, भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग। महात्मा गांधी कर्म मार्गी थे। रबीन्द्रनाथ टैगोर भक्ति मार्गी थे। बाल गंगाधर तिलक एवं श्री अरविन्दों तथा गोपीनाथ कविराज ज्ञान मार्गी थे। कर्म मार्गी के रूप में भारत की सेवा करने वाली तथा कथित शुद्र जातियां महात्मा गांधी की प्रेरणा स्रोत थीं। बढ़ई, लुहार, कुम्हार जैसी शुद्र जातियों ने भक्ति आंदोलन के दौरान 12 वी शताब्दी से 18वी शताब्दी तक कर्म मार्ग और भक्ति मार्ग में समन्वय किया था। महात्मा गांधी ने भी इसी समन्वय को अपने हिन्द- स्वराज का आधार बनाया था। मनुष्य जीवन का लक्ष्य आत्म - साक्षात्कार (यथार्थ) और ब्रहम - साक्षात्कार (संभावना) है। आधुनिक मानव वाद का लक्ष्य एक ऐसे संसार की रचना एवं विकास है जिसमें व्यक्ति को यांत्रिक मशीनों  एवं उपयोगितावादी विचारधारा के आधार पर असीमित सुविधाओं का उपभोग करने, प्रकृति का कृत्रिम रूप से असीमित दोहन करने और कानूनी समझौता के आधार पर प्रकृति एवं ब्रहमांड के संसाधनों का विलासिता के लिए मनमाना बंदर बांट करने का अधिकार है। इस विचारधारा को मानव वाद कहा जाता है। महात्मा गांधी इसको शैतानी सभ्यता की विचारधारा कहते थे जिसमें ईश्वर, सत्य, अहिंसा, सर्वोदय और सबका मंगल या कल्याण के लिए कोई जगह नहीं है। कुछ अन्य लोग इसको उपभोक्तावादी अपसंस्कृति और पूंजीवादी  व्यक्तिवाद भी कहते हैं। लेकिन इस विचारधारा के समर्थक इसको मानव वाद कहना ही पसन्द करते हैं। मानव वाद शब्द संदर्भ से काटकर सुनने और कहने में अच्छा लगता है।

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