Dr Amit Kumar Sharma

समकालीन भारत में परिवार

लेखक

डा० अमित कुमार शर्मा

समाजशास्त्र विभाग,

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली - 110067

समकालीन भारत में परिवार

Copyright © Dr. Amit Kumar Sharma

भारत के अधिकांश सामाजिक-धार्मिक एवं सांस्कृतिक समूहों में संयुक्त परिवार एक सांस्कृतिक मूल्य रहा है, व्यावहारिक स्तर पर नाभिकीय घरों का प्राचीन काल से ही अस्तित्व रहा है। आज नगरीकरण, स्थानांतरण, औद्योगिकीकरण्, पश्चिमी शिक्षा के प्रसार एवं पश्चिमीकरण की प्रक्रिया जैसे कारकों ने एक नए प्रकार के घर एवं परिवार का भारत में विकास किया है। इन कारकों ने संरचनात्मक दृष्टि से भारत में संयुक्त परिवार को समाप्त तो नहीं किया है, परन्तु इनके कारण पहले से ही कायम नाभिकीय घरों एवं परिवारों के व्यावहारिक चलन को नि:संदेह बल मिला है। इसके साथ-साथ, एक हद तक नाभिकीय परिवार के रूप में एक वैकल्पिक सांस्कृतिक मूल्य का भी प्रसार हुआ है। आधुनिक संचार के साधनों ने भी नाभिकीय परिवार के नए सांस्कृतिक मूल्य के प्रसार में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है।   

     जनांकिकीय कारकों ने, दूसरी ओर, संयुक्त परिवार एवं संयुक्त घर की संस्था को मजबूत किया है। जनगणना के आंकड़े एवं नृजातीय अधययनों से यह ज्ञात हुआ है कि भारतीय घरों के औसत आकार में आई बढ़ोतरी बुजुर्ग सदस्यों की बढ़ी संख्या के कारण है न कि बच्चों की बढ़ी संख्या के कारण। कई कारणों से पहले भारत में एक व्यक्ति की औसत आयु इतनी कम हुआ करती थी कि संयुक्त घरों का बनना या लंबे समय तक उनका संयुक्त रहना जनांकिकीय (जनसांख्यिकीय) रूप से संभव नहीं था। चिकित्सा की सुविधाओं के बढ़ने एवं अन्य कारकों के कारण अब एक व्यक्ति की औसत आयु में काफी बढ़ोतरी हुई है। फलस्वरूप लंबे समय तक संयुक्त परिवार का बने रहना अब संभव हो गया है।    

     ए.एम. शाह का कहना है कि सामान्यत: घर का औसत आकार ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरों में छोटा रहा है, 1951 से ही यह शहरी तथा ग्रामीण दोनों इलाकों में बढ़ रहा है परंतु शहरी समाज के एक वर्ग में खासकर महानगरों में, छोटे आकार के नाभिकीय परिवार एवं घर एक संस्था के रूप में स्वीकृत हो रहे हैं। नाभिकीय परिवार पश्चिमीकरण से गुजरता  हुआ मधयम वर्ग, पेशेवर वर्ग (प्रोफेशनलस) तथा महानगरों में रहने वाली ऊँची जातियों तक सीमित है। महानगरों में रहने वाला मध्यम वर्ग भारतीय समाज का आधुनिक एवं तेजी से विकसित होने वाला वर्ग है। यह पश्चिमी शैली के व्यक्तिवादी विचारधारा के सबसे अञ्कि प्रभाव में रहने वाला वर्ग है। इस वर्ग में बेटियों के प्रति उदार दृष्टिकोण विकसित हुआ  है जिसके परिणामस्वरूप पुत्र का अभाव विशेष चिंता का विषय नहीं  होता।

     मधयमवर्ग के पेशेवर लोगों ने छोटे परिवार के मूल्य को स्वीकार कर लिया है। फलस्वरूप, इस वर्ग ने एक या दो संतान के आदर्श को व्यवहार में लाना शुरू कर दिया है। विवाह के बाद बच्चे आवश्यक रूप से अपने माता-पिता के साथ संयुक्त निवास स्थान (घर) में नहीं रहते। इस वर्ग के लोगों में ज्यादा उम्र में विवाह करने का चलन व्याप्त है एवं विवाह के बाद पुत्र तथा  पुत्रवधु का कार्यस्थल माता-पिता के निवास स्थान से सामान्यत: काफी दूर हो सकता है। ये लोग संयुक्त परिवार के आदर्श को मानते हुए भी संयुक्त घरों में लंबे समय तक नहीं रह पाते हैं।

छोटे नाभिकीय घरों में निम्नलिखित विशेषताएं पायी गई हैं :-

1. छोटे आकार के घर सदस्यों को ज्यादा स्वतंत्रता एवं स्वावलंबन प्रदान करते है।

2. ऐसे घरों में संयुक्त घरों की तुलना में व्यक्ति ज्यादा उत्तरदायित्व महसूस करता है।

3. पेशेवर मधयमवर्ग के लिए शहरी परिवेश में ऐसे घर आर्थिक रूप से ज्यादा सुविधाजनक बन गए हैं।

4. समकालीन परिवेश में नाभिकीय घर संकट की स्थिति से निबटने में ज्यादा अनुकूल पाए गए है। बीमा, बैंकिंग तथा चिकित्सालयों जैसी आधुनिक सुविधाओं ने संयुक्त परिवारों द्वारा दिए जाने वाले पारंपरिक सुरक्षा एवं सुविधाओं को संपन्न पेशेवर वर्गों के लिए कम आकर्षक बना दिया है।

5. बच्चों के दृष्टिकोण से नाभिकीय घरों के लाभदायक ओर हानिदायक दोनों आयाम हैं। मनोवैज्ञानिकों एवं समाजवैज्ञानिकों ने बच्चों के विकास में दादा-दादी एवं अन्य वरिष्ठ संबंधियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार  किया है।  कभी-कभी नाभिकीय घरों में माता-पिता दोनों  बाहर काम करते हैं।    फलस्वरूप बच्चे काफी अकेलापन एवं चिंता महसूस करते हैं। उन्हें नौकरों, घर की देखभाल करने वालों, क्रीड़ा-विद्यालय एवं अन्य औपचारिक माधयमों पर निर्भर रहना पड़ता है।  कई बार इसके चलते उन्हें भावनात्मक दबाव झेलना पड़ता है और उनका व्यक्तित्व भावनात्मक रूप से निरीह हो जाता है। परंतु अधिकांशत: बच्चे  इन  परिस्थितियों को झेलना सीख जाते हैं और  उनमें स्वतंत्रता  एवं  व्यक्तिवाद की   भावना विकसित हो जाती है।

     ज्यादातर भारतीय आज भी संयुक्त घरों में रहते हैं तथा संयुक्त परिवार का आदर्श आज भी कायम है। समकालीन दबाव में संयुक्तता का सांस्कृतिक भाव एवं सदस्यों के बीच भावनात्मक जुड़ाव कमजोर पड़ने लगा है। परिवार के मुखिया यार् कत्ता का नैतिक अधिकार भी कमजोर हो गया है। आजकल पारिवारिक निर्णय विचार-विनियम या समझौते की एक प्रक्रिया के तहत होता है। भारतीय संसद ने परिवार के महिला सदस्यों के हितों की रक्षा के लिए कई विधेयक पास किये हैं। शिक्षा ने भी बच्चों तथा महिलाओं का सबलीकरण किया है। फलस्वरूप, संयुक्त परिवार के मूल्य आदर्श एवं प्रथाएँ तेजी से बदल रही हैं। संयुक्त घरों को बदलते हुए मूल्यों एवं प्रथाओं के साथ अनुकूलन स्थापित करना पड़ रहा है। इन परिवर्तनों की छाया पिछले दो दशकों के सिनेमा एवं टेलिविजन माधयमों से देखने को मिल सकती है क्योंकि सिनेमा तथा टेलिविजन के कार्यक्रमों ने आधुनिक संदर्भ में संयुक्त परिवार तथा घर के बदलते आयामों को अक्सर अपना विषय-वस्तु बनाया है। कुल मिलाकर, संयुक्त परिवार तथा घर की संस्था में अनुकूलन स्थापित करने की दृष्टि से प्रकार्यात्मक परिवर्तन ज्यादा हो रहे हैं । भारतीय समाज तथा संस्कृति का लचीलापन परिवार रूपी संस्था में आज भी देखने को मिलता है। संरचनात्मक दृष्टि से संयुक्त परिवार का आदर्श और संयुक्त घराने की उपयोगिता में ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ है।

 

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यह लेख भारतीय संस्कृति का स्वरुप नामक पुस्तक से ली गई है।

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