Dr Amit Kumar Sharma

भारतीय संस्कृति में गाँव एवं शहर

लेखक

डा० अमित कुमार शर्मा

समाजशास्त्र विभाग,

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली - 110067

समकालीन भारत में नगरीय क्षेत्रों का निर्धारण

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प्रत्येक व्यक्ति न केवल एक परिवार से अपितु समुदाय से भी  संबंध रखता है। समुदाय की दो विशेषता मानी गई है एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र एवं इसके सदस्यों के बीच ' हम की भावना ' गाँव और शहर समुदाय के दो रूप हैं। समुदाय के सदस्य सामान्य रूप से इसमें स्थायी रूप से निवास करते है।समुदाय का भाव अपने पास-पड़ोस से आरम्भ होकर कुछ अंश तक 'हम-भावना' से सामाजिक वर्ग तक फैलता है। किसी भी संस्कृति की पूर्ण अभिव्यक्ति समुदायों के अंतर्गत ही होती है।

     गाँवों में रहना मानव समाज की एक चिरपरिचित विशेषता रही है जो मानव सभ्यता के उदय काल से परिलक्षित होती है। ग्रामीण समुदाय एक प्रकार का विस्तृत प्राथमिक समूह है।  इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि इसके अधिकांश सदस्य कृषि या पशुपालन के कार्य में लगे रहते हैं और इनका जीवन प्रकृति पर बहुत अधिक निर्भर रहता है। इनके सदस्यों के बीच  सामान्यत: घनिष्ठ एवं आत्मीय संबंञ् होता है जो आमने सामने के संपर्कों पर आधारित होता है। इसके सदस्य इसमें स्थायी रूप से निवास करते हैं और अपने सांस्कृतिक मानदंडों पर अपने व्यक्तिगत एवं सामुदायिक जीवन को पूर्णता देने की कोशिश करते हैं। नगरीय समुदाय लोगों का एक खुला संगठन है जिसमें व्यक्ति एक सीमित क्षेत्र में रहते है, जहाँ जनसंख्या-घनत्व अपेक्षाकृत अधिक होता है तथा जीविका का साधन शिल्प, उद्योग या व्यापार होता है। नगरीय जीवन जटिल सामाजिक शक्तियों का प्रतिफल होता है। ये सामाजिक शक्तियाँ जनसंख्या के संवेग, ग्रामीणों के अप्रवास, संचार एवं यातायात के साधनों के विकास, व्यापारिक केंद्रों की अत्यधिक वृध्दि और औद्योगीकरण के प्रभाव से विकसित होती हैं। अमेरिकन मानवशास्त्री राबर्ट  रेडफील्ड प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने समुदायों का सुव्यवस्थित अधययन किया। इनका अध्ययन उद्विकासवादी सिध्दांत पर आधारित है। इनकी दृष्टि में अल्प - विकसित समाजों में लघुसमुदाय ( गाँव) एवं विकसित समाजों में बृहत् समुदाय (शहर) का विकास होता है। गाँवों की संस्कृति को उन्होंने सरल, अविकसित एवं स्थानीय माना जबकि शहरों की संस्कृति को जटिल - विकसित एवं सार्वभौमिक माना। भारतीय संदर्भ में यह दृष्टि दोषपूर्ण है।

 

     भारतीय समाज में सिन्धु घाटी की सम्यता के जमाने से ही  गाँवों और शहरों का सहअस्तित्व रहा है। दोनों समुदाय एक - दूसरे के पूरक रहे हैं। दोनों की संस्कृति में विशेष अंतर नहीं रहा है। जबकि पश्चिम में विकसित आञ्निक समाज में ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों के बीच बहुत अंतर है। पाश्चात्य विचारक गाँव एवं नगर के अंतर पर विशेष बल देते हैं जहाँ नगरों को गाँवों से श्रेष्ठ माना जाता है। पश्चिमी समाजों में  गाँव अधिकांशत: आर्थिक रूप से कमजोर, विशेषज्ञता और कौशल में निम्न और मुख्यत: नगरों पर आश्रित थे। दूसरी तरफ अंग्रेजी शासन के पूर्व भारतीय ग्रामीण समाज अपेक्षाकृत शक्तिशाली एवं स्वतंत्र थे एवं ग्रामीण्ा लोग अनेक व्यवसायों एवं कलाओं में दक्ष थे।

     समकालीन भारत में नगरीय क्षेत्रों का निर्धारण राज्य सरकारों द्वारा होता है और इसके लिए विभिन्न राज्यों ने भिन्न-भिन्न मानदंडों का प्रयोग किया। ये संविधिक शहर कहलाते हैं तथा प्रशासनिक कार्यों के लिए शहरी विकास मंत्रालय से अनुदान प्राप्त करते हैं। इन शहरों का शासन अलग प्रकार की इकाइयाँ जैसे नगरपालिका, अधिसूचित क्षेत्रीय समिति अथवा निगम के द्वारा होता है।

     संविधिक शहरों के अलावा जनगणना के आधार पर भी शहरों को परिभाषित किया जाता है। जनगणना अधिकारी संपूर्ण भारतीय क्षेत्र को दो वृहत समूहों में विभाजित करते हैं - ग्रामीण एवं नगरीय केन्द्र।  इस वर्गीकरण का कानूनी या प्रशासनिक आशय नहीं होता है इसका उद्देश्य अकादमिक सुस्पष्टता एवं सामाजिक मानकों का सांस्कृतिक संदर्भ समझने के लिए किया जाता है। यह वर्गीकरण  जनगणना निदेशालयों द्वारा स्वीकृत होता है। इसके अतिरिक्त, जनगणना अधिकारियों ने अपने अलग मानदंड निर्मित कर रखे हैं जिनके आधार पर वे किसी संविधिक क्षेत्र को शहर अथवा कस्बा घोषित करते हैं। ये आधार निम्न हैं :

1.   न्यूनतम जनसंख्या 5000 या उससे अधिक हो।

2.   कम से कम 75 प्रतिशत व्यस्क पुरूष जनसंख्या गैर कृषि कार्यों में लगी हो एवं

3.   जनसंख्या घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति प्रति किलोमीटर हो।

 

 

आवास के प्रकार  

भारतीय जनगणना आकार एवं जनसंख्या के घनत्व के आधार पर तीन प्रकार के आवासों का निर्धारण करती है : नगर, कस्बा एवं गाँव।

1.   वह आवास जिसकी जनसंख्या 1,00,000 या अधिक हो वह नगर कहलाता है।

2.   एक कस्बे की जनसंख्या 5,000 या इससे अधिक होनी चाहिए तथा गाँवों की जनसंख्या 5,000 से कम होनी चाहिए।

3.   नगर की स्थानीय शासन व्यवस्था नगरपालिका तथा गाँव की ग्राम पंचायत कहलाती है।

     नगर एवं शहरों को एक साथ नगरीय वर्ग में तथा शेष आवासों को ग्रामीण वर्ग में रखा गया है। नगर के मानदंड हैं- आकार, घनत्व, व्यवसाय-संरचना  तथा प्रशासनिक व्यवस्था।

 

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यह लेख भारतीय संस्कृति का स्वरुप नामक पुस्तक से ली गई है।

भारतीय संस्कृति का स्वरुप bhartiye sanskriti ka swaroop

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