Dr Amit Kumar Sharma

डा. बी. आर. अम्बेडकर का बौध्द धर्म के विकास में सैध्दांतिक योगदान

लेखक

डा० अमित कुमार शर्मा

समाजशास्त्र विभाग,

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली - 110067

डा. बी. आर. अम्बेडकर का बौध्द धर्म के विकास में सैध्दांतिक योगदान

Copyright © Dr. Amit Kumar Sharma

डा. अम्बेडकर के धार्मिक विचारों को समझने की दृष्टि से उनकी दो महत्त्वपूर्ण पुस्तकें हैं - रिडल्स आफॅ हिन्दूइज्म एवं बुध्दा एंड हिज धम्म। प्रथम पुस्तक में उन्होंने हिन्दू समाज व्यवस्था के सामाजिक एवं धार्मिक अंतर्विरोधों की चर्चा की है। जबकि दूसरी पुस्तक में गौतम बुध्द के द्वारा प्रतिपादित बौध्द धर्म की व्याख्या की है। उन्होंने गौतम बुध की पालि भाषा में दिए उपदेशों का युगानुकुल भाष्य करने के क्रम में इसे धर्म की जगह धम्म कहने पर जोर दिया है।

     भगवान बुध्द के उपदेश में ''अपना दीपक खुद बनने'' पर जोर है। भगवान बुध्द की धम्म में दूसरे की कही, देखी और लिखी बातों पर आस्था या विश्वास की जगह ''आत्मानुभूति और आत्मसाक्षात्कार'' पर जोर है। जब आत्मानुभूति और आत्मसाक्षात्कार होता है तो करूणा, शील और प्रज्ञा की उत्पत्ति होती है। पारंपरिक बौध्द धर्म आगे चलकर दो महत्त्वपूर्ण सम्प्रदायों में विभाजित हो गया था। थेरवादी सम्प्रदाय (जिसके अनुयायी श्रीलंका, बर्मा और थाइलैंड जैसे देशों में ज्यादा हैं) का आग्रह आत्मसाक्षात्कार (अपने दीपक खुद बनने की प्रक्रिया) के बाद व्यक्तिगत निर्वाण (या मुक्ति) पाने पर ज्यादा जोर रहा है। यह बौध्द धम्म का पारंपरिक और ज्यादा लोकप्रिय सम्प्रदाय रहा है। दूसरी ओर महायान सम्प्रदाय के लोग (जिसके अनुयायी तिब्बत और जापान तथा पश्चिम के कुछ देशों में पाए जाते हैं) आत्मसाक्षात्कार के बाद व्यक्तिगत निर्वाण प्राप्त करने की बजाय सामूहिक निर्वाण प्राप्त करने की करूणावश सुकर्म करने पर ज्यादा जोर देते हैं। महायान सम्प्रदाय के संस्थापक आचार्य नागार्जुन एवं असंग माने जाते हैं जबकि थेरवादी सम्प्रदाय के सबसे प्रमुख आचार्य महात्मा बुध्द, भिक्षु आनंद, महाकश्यप और मोगलिपुत्र तिष्य माने जाते हैं।

आधुनिक भारत में बौध्द धर्म के विकास में महाबोधी सोसाइटी ऑफ श्रीलंका के संस्थापक अनागरिक धर्मपाल की सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में वे थेरवादी सम्प्रदाय के सबसे प्रमुख संगठक और नेता साबित हुए। उनके प्रयासों से पहले लद्दाख, सिक्किम और हिमालय की तराई में बौध्द धर्म के अनुयायी रहते थे लेकिन बिहार, नेपाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश,  मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के बौध्द मंदिरों, विहारों, स्तुपों के प्रति स्थानीय समुदाय का उदासीन भाव था। फलस्वरूप, अन्य देशों के बौध्द पर्यटकों को कई प्रकार की असुविधा होती थी। 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में श्रीलंकाई पिता और अंग्रेज मां के बेटे आनंद केंटिश कुमारस्वामी ने बौध्द एवं हिन्दू कला के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से हिन्दू धर्म एवं बौध्द धर्म के बीच सभ्यतामूलक एकता को रेखांकित किया। 1956 में अपनी मृत्यु से पूर्व डा. अम्बेडकर अपने अनुयायियों के साथ सामूहिक रूप से बौध्द, धर्म में दीक्षित हुए तो उनके धर्मोंपदेशक आचार्य थेरवादी सम्प्रदाय एवं बर्माई मूल के एक भंते थे। अत: वे महाबोधी सोसाइटी ऑफ श्रीलंका से जुड़ गए। अपने लंबे सामाजिक जीवन में वे लगातार महात्मा बुद्व और संत कबीर की रचनाओं का हिन्दू धर्म की समालोचना करने में इस्तेमाल करते रहे थे। संत कबीरदास चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी के बीच भारत में निर्गुण भक्ति के सबसे प्रमुख आचार्य हुए हैं जिनका मराठी ज्ञानोदय की संत परंपरा में तुकाराम और नामदेव पर निर्णायक प्रभाव माना जाता है। पंजाब के महान गुरू नानक पर भी कबीरदास का महत्त्वपूर्ण प्रभाव था। कबीरदास पर बौध्द तंत्रागम से प्रभावित सिध्दों एवं नाथों के महान आचार्य गुरू गोरखनाथ का प्रभाव था। बाद में वे उत्तर भारत के महान वैष्णव आचार्य रामानंद से भी प्रभावित हुए। 15वीं शताब्दी से कबीरपंथ एक स्वतंत्र सम्प्रदाय के रूप में विकसित हुआ। डा. अम्बेडकर का परिवार एक कबीरपंथी परिवार था। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांसीराम का जन्म एक नानकपंथी सिख परिवार में हुआ था। डा. अम्बेडकर के ज्यादातर उत्तर भारतीय अनुयायियों का परिवार ज्यादातर महान भक्त संतो के पंथ, मठ या आश्रम से संबंधित रहा है। कबीर, तुकाराम, नामदेव, नानक, रविदास (रैदास), दादू, ताना आदि गैर-ब्राह्मण संतो के सवर्ण अनुयायियों की संख्या भी कम नहीं रही है। भारत में भक्ति सम्प्रदाय का जन्म पहले दक्षिण भारत में हुआ। लेकिन दक्षिण भारत के भक्तों का सीधे-सीधे उत्तर भारत पर प्रभाव नहीं हो गया। ईसा-पूर्व छठी शताब्दी से 12वीं शताब्दी तक उत्तर भारत में बौद्व धर्म का नियंत्रण नालंदा के महान गुरूकुल और बौध्द विहार से होता था। 13वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी ने नालंदा के गुरूकुल (बौध्द विश्वविद्यालय) और बौध्द विहार को नष्ट कर दिया। कुछ बौध्द भिक्षु तिब्बत और अन्य स्थानों पर चले गए। अन्य लोग देश के विभिन्न भागों में सिध्द और नाथ योगी के रूप में बिखर गए। 14वीं शताब्दी में उत्तर भारत के भक्ति सम्प्रदायों के विकास में इन सिध्दों और नाथ योगियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन एक स्वतंत्र धर्म के रूप में बौध्द धर्म की सांस्कृतिक अस्मिता और राजनैतिक संगठन 19वीं शताब्दी के अंत में अनागरिक धर्मपाल के भारत आने और महाबोधी सोसाइटी के निर्माण (1891) के बाद ही हो पाया।    

  डा० अमित कुमार शर्मा के अन्य लेख अगला पेज

 

भारतीय संस्कृति का स्वरुप bhartiye sanskriti ka swaroop

BUY THIS BOOK

 

top