Dr Amit Kumar Sharma

भारत में नातेदारी

लेखक

डा० अमित कुमार शर्मा

समाजशास्त्र विभाग,

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली - 110067

भारत में नातेदारी

Copyright © Dr. Amit Kumar Sharma

प्रत्येक समाज नातेदारी संबंधों का ढांचा प्रस्तुत करता है। अपने नाभिकीय परिवार के बाहर व्यक्ति के द्वितीयक एवं तृतीयक संबंध होते हैं। हर व्यक्ति के प्राथमिक संबंधी तो उसी  नाभिकीय परिवार में पाए जाते हैं। नातेदारी संस्कृति का वह हिस्सा है जो जन्म और विवाह के आधार पर बने संबञें एवं संबंध की अवधारणाओं एवं विचारों से संबंधित होता है। नातेदारी संगठन व्यक्तियों के उस समूह को इंगित करता है जो या तो एक-दूसरे के रक्त संबंधी होते हैं या वैवाहिक संबंधी।

     जी. डंकन मिचेल के अनुसार, जब हम नातेदारी शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो हम लोग रक्त-संबंधियों एवं विवाह संबंधियों को संदर्भित कर रहे हैं। रक्त संबंधियों में सामान्यत: उन्हें शामिल किया जाता है जिनके बीच सामुहिक रूप से तथाकथित रक्त संबंध पाया जाता है। रक्त संबंधी वह है जिसका या तो उस परिवार में जन्म हुआ है या उसे परिवार द्वारा गोद लिया गया हो। जबकि विवाह संबंधी उसे कहते है जिसके साथ संबंध का माधयम विवाह हो। उदाहरण के लिए पिता-पुत्र संबंध एक रक्त संबंध है जबकि पति-पत्नी संबंध एक विवाह संबंध है।

         नातेदारी दो महत्त्वपूर्ण एवं संबंधित उद्देश्यों की पूर्ति करता है -

(1)  यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पस्थिति, प्रतिष्ठा एवं संपत्ति के हस्तांतरण को संभव बनाता है, तथा (2) कुछ समाजों में यह प्रभावी सामाजिक समूह के निर्माण को कायम रखने में प्रभावी होता है। नातेदारी व्यवस्था परिवार एवं विवाह जैसी दो जुड़ी संस्थाओं का प्रतिफल है ओर यह जन्म, मृत्यु एवं पुरूष-स्त्री के शारीरिक संबंध से जुड़े सामाजिक व्यवहार का नियमन करता है। नातेदारी एक-दूसरे के प्रति अधिकारों तथार् कत्तव्यों के बारे में तथा एक-दूसरे की अभिरूचियों एवं अपेक्षाओं के बारे में बतलाता है।

          ज्यादातर समाजों में जहाँ नातेदारी संबंध महत्त्वपूर्ण होते हैं वंशावली तय करने के स्पष्ट नियम होते है। वंश कई पीढ़ियों के लोगों को जोड़ता है। वंशावली के आधार पर यह बतलाया जा सकता है कि किस व्यक्ति की उत्पत्ति किस व्यक्ति से हुई है। वंशावली तय करने के कई तरीके है।

(क) एक पक्षीय वंश - माता-पिता में से जब केवल एक पक्ष को ही वंशावली में गिनने की प्रथा हो तो उसे एक पक्षीय वंश कहते है। इसके भी दो रूप हैं :-

(1) पितृवंशीय - इसमें वंश का र्निधारण या गणना केवल पिता या दादा जैसे पुरूष संबंधियों से संबंध स्थापित करके किया जाता  है। पितृवंश में पुत्रों के साथ-साथ पुत्रियों की गिनती भी की जाती है। वंश पिता या दादा के नाम से जाना जाता है।

(2) मातृवंशीय - इसमें वंश का र्निधारण मां या नानी जैसे स्त्री संबंञ्यिो के साथ संबंध स्थापित करके किया जाता है। मातृवंश में पुत्रियों के साथ पुत्र की गिनती भी की जाती है। वंश माता या नानी के नाम से जाना जाता है।

(3) द्विवंशीय - यह भी एक पक्षीय वंश का ही एक रूप है जिसमें मातृवंशीय एवं पितृवंशीय के गुण मिले रहते है। वंशावली का  र्निधारण पिता या माता के एक ही पक्ष के आधार पर किया जाता है। परन्तु अलग-अलग उद्देश्यों के लिए अलग-अलग वंशावली तैयार की जाती है। उदाहरण के लिए, अचल संपत्ति के हस्तांतरण के लिए एक पक्ष (पिता) एवं चल संपत्ति के हस्तांतरण के लिए दूसरा पक्ष (माता) के साथ संबंध स्थापित कर वंशावली तैयार की जाती है।

(ख ) द्विपक्षीय वंश - यह एक पक्षीय वंश नहीं होकर द्विपक्षीय वंश होता है। इसमें एक ही साथ माता और पिता, पुरूष पूर्वज एवं स्त्री पूर्वज दोनो के तरफ से (एक साथ, एक ही उद्देश्य के लिए) वंशावली तैयार की जाती है।

 

          भारत में सामान्यत: पितृवंशीय एवं मातृवंशीय दोनों प्रकार की व्यवस्थाएँ पायी जाती है। उत्तर भारत में पितृवंशाीय व्यवस्था ज्यादा पाई जाती है। जनजातियों में संथाल एवं मुंडा जैसी जनजातियाँ पितृवंशीय हैं। यह मनोरंजक है कि बहुपति विवाह के रिवाज को मानने वाले टोड़ा लोग भी पितृवंशीय है। जनजातियों में उत्तर-पूर्व के खासी तथा गारो लोग मातृवंशीय व्यवस्था मानते हैं। केरल की नायर जाति मातृवंशीय व्यवस्था का सर्वोत्तम उदाहरण है।

     एकपक्षीय वंश समूह को गोत्र या कुल कहा जाता है। गोत्र या वंश नातेदारों का ऐसा समूह है जिसमें सभी पूर्वजों के साथ ज्ञात कड़ियों के आधार पर वंशानुगत संबंध स्थापित किया जाता है। एक कुल कई वंशों के मिलने से बनता है। कुल नातेदारों का ऐसा समूह है जिसके सदस्य सामूहिक रूप से एक साझे पूर्वज से अपने को जोड़ते हैं परन्तु वे ज्ञात वंशावली के आधार पर उस पूर्वज से संबंध नहीं जोड़ पाते।

     एकपक्षीय वंश समूह के सदस्य सामान्यत: कर्मकाण्ड तथा अनुष्ठानिक उत्सवों के अवसर पर साथ-साथ उपस्थित होते हैं। उत्तराधिकार के नियम अधिकांशत: वंशावली के द्वारा नियमित होते है। भारत के अधिकांश भाग में अभी हाल तक जमीन एवं घर जैसी अचल संपत्ति नजदीकी पुरूष संबंधियों  को हस्तांतरित होती थी। हाल के कानूनी विधेयकों ने पिता की संपत्ति में पुत्री को भी अधिकार प्रदान किया है।

 

नातेदारी : पारिभाषिक शब्दावली

     प्रसिध्द मानवशास्त्री ए.आर. रैडक्लिफ-ब्राउन का कहना है कि नातेदारी में प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दावली अन्य विशेषताओं के अतिरिक्त एक निश्चित नातेदार के अधिकारों एवंर् कत्तव्यों के वर्गीकरण की ओर संकेत करता है। उनके पहले एल.एच. मौर्गन ने कहा था कि नातेदारी शब्दावली हमारे सामाजिक संबंधों के संदर्भ तथा मुहावरे प्रदान करता है। मौर्गन ने नातेदारी में प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दावलियों की दो व्यवस्थाओं की चर्चा की है :- (क) वर्गात्मक, तथा (ख) वर्णनात्मक।

     वर्गात्मक व्यवस्था में नातेदारी में प्रयुक्त शब्दावली के अंतर्गत एक ही शब्द के द्वारा भिन्न प्रकार के नातेदारों को वर्गीकृत या संबोधित किया जाता है।

     वर्णनात्मक व्यवस्था में हर नातेदारी शब्द केवल एक खास नातेदार एवं एक खास संबधी के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के लिए, मां के भाई को मामा, पिता के भाई को चाचा तथा पिता की बहन के पति को फूफा कहा जाता है। ज्यादातर समकालीन समाजों में दोनों प्रकार के (वर्गात्मक एवं वर्णनात्मक) शब्दों का उपयोग किया जाता है। नाभिकीय परिवार के अंदर माँ, पिताजी जैसे वर्णनात्मक शब्दों का उपयोग किया जाता है।

          उत्तर भारतीय नातेदारी शब्दावली तुलनात्मक रूप से वर्णनात्मक है।  यह व्यक्ति के प्राथमिक संबञें का वर्णन करता हैं। पितृपक्षीय वंशावली को स्पष्ट करने लिए चचेरे और फुफेरे तथा मातृवंशीय वंशावली को परिभाषित करने के लिए ममेरे एवं मौसेरे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। जैसे भाई के पुत्र को भतीजा एवं बहन के पुत्र को भांजा कहा जाता है। इसके विपरीत, दक्षिण भारतीय नातेदारी शब्दावली में तुलनात्मक रूप से वर्गात्मक शब्दावली पर जोर दिया जाता है। यहाँ एक ही शब्द मामा के द्वारा माता का भाई, पत्नी का पिता एवं पिता की बहन का पति तीनों का बोध होता है ।

 

विशिष्ट नातेदारी शब्दावली, प्रथाएँ एवं नातेदारी व्यवहार

     समाज में व्यवस्था एवं मर्यादा बनाये रखने के लिए कुछ व्यवहारों को आवश्यक व्यवहार के रूप में सामाजिक मान्यता एवं स्वीकृति प्राप्त होती है। हंसी - मजाक का संबंध भी इसी प्रकार का एक मान्यता प्राप्त व्यवहार है। हंसी-मजाक के संबंध में दो संबंधियों के बीच एक प्रकार की समानता एवं पारस्परिकता का संबंध होता है। उदाहरण के लिए, एक पुरूष का अपनी पत्नी  की छोटी बहन (जीजा-साली) एवं एक स्त्री का अपने पति के छोटे भाई के साथ के संबंध (भाभी-देवर) को हंसी-मजाक का संबंध कहा जाता है। कुछ कृषक जातियों में पति की असामयिक मृत्यु के बाद भाभी का देवर से विवाह उत्तर भारत में देखा गया है। पत्नी की असामयिक मृत्यु के बाद जीजा-साली का विवाह तो उससे भी ज्यादा लोकप्रिय प्रथा है।

     अन्य प्रकार के हंसी-मजाक के संबंध भी महत्त्वपूर्ण हैं। उदाहरण के लिए, कुछ समुदायों में दादा-दादी के साथ या नाना-नानी के साथ भी बच्चों का हंसी-मजाक का संबंध होता है। यहां हंसी-मजाक के संबंध अनौपचारिकता, आत्मीयता एवं असीमित स्वतंत्रता के माहौल में बच्चों के विकास में मदद करते हैं।

     हंसी-मजाक के संबंध के विपरीत, एक प्रकार के निषेध का संबंध भी नातेदारों के बीच पाया जाता है। उदाहरण के लिए एक स्त्री का अपने पति के बड़े भाई या पिता से निषेध का संबध होता है। पति के पिता को श्वसुर (ससुर) एवं पति के बड़े भाई को जेठ या भैंसुर कहा जाता है।

 

टेकनोनामी

टेकनोनामी की प्रथा भारत के कई ग्रामीण समुदायों में काफी लोकप्रिय है। यह बच्चों के नाम के आधार पर माता-पिता के नामकरण की प्रथा है जैसे, रामू की मां (या सीता के पिताजी) इस प्रथा का एक निहितार्थ यह है कि कई समुदायों में एक स्त्री अपने ससुराल में अपनी पहली संतान के बाद ही पूर्ण सदस्य बन पाती है। फलस्वरूप उसकी पहचान में (प्रथम) संतान का नाम जुड़ना स्वभाविक बन जाता है।

 

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यह लेख भारतीय संस्कृति का स्वरुप नामक पुस्तक से ली गई है।

भारतीय संस्कृति का स्वरुप bhartiye sanskriti ka swaroop

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