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Maharajganj District Uttar Pradesh

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Geography of Maharajganj

Geography of Maharajganj

co-ordinate 25°50 to 26°20′N 83°25′to 84°20′E

The District Maharajganj came into existence on 2nd October, 1989. This newly created District is situated at INDO NEPAL Border. Its boundaries touch Nepal Estate in north, Gorakhpur district in south, Padrauna district in east and Siddharth Nagar & Sant Kabir Nagar districts in west. Its shape is about rectangular.Total area of district is 2934.1 sq. Km., out of which 11.59% area is covered by forest. This district is part of Gorakhpur Division. The district has a population of 2,173,878 (2001 Census).

Maharajganj district comprises 4 tehsils:

Maharajganj Sadar tehsil has 4 community development blocks: Maharajganj, Ghughali, Paniara and Partawal. Nautanwa tehsil consists 2 community development blocks: Ratanpur and Laxmipur. Nichlaul tehsil has 3 community development blocks: Nichlaul, Mithaura and Siswa. Pherada tehsil also has 3 community development blocks: Bridgmanganj, Dhani and Pheranda. The number of villages in this district is 1258.There are 13 (thirteen) Police Station (P.S.) in Maharajganj district. There are given below 1. Pharenda 2. Nautanwa 3. Purandarpur 4. Kothibhar 5. Thuthibari Kotwali 6. Kolhui 7. Brijmanganj 8. Shyamdeurawa 9. Parsamalik 10. Bargadawa 11. Paniyara 12. Chauk 13. Sonauli Kotwali.

भौगोलिक सीमायें

जनपद महाराजगंज प्रदेश के पूर्वोत्तर कोने पर स्थित हैं जिसका अक्षांशीय विस्तार 25.50 अंश से 26.20 अंश उत्तरी अक्षांश तथा 83.25 अंश से 84.20 अंश पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है, जो समुद्र तल से लगभग 200 फीट ऊपर है| इस जनपद की सीमाओं पर उत्तर में नेपाल, पूरब में बिहार राज्य  तथा जनपद कुशीनगर, दक्षिण में गोरखपुर, पश्चिम में संत कबीर नगर स्थित है

मौसम / जलवायु

महाराजगंज जनपद उपोष्ण कटिबन्ध में स्थित है | हिमालय से मात्र 15 किलोमीटर दूर होने के कारण यहाँ पर इसकी अक्षांशीय स्थित की अपेक्षा हिमालय पर्वत का प्रभाव अधिक है | इस जनपद में पश्चिमी हवायें नवम्बर से मई तक चलती है | स्थलीय क्षेत्र में प्रवाहित होने के कारण यहाँ हवायें शुष्क होती हैं | जून से अक्टूबर तक इस जनपद में दक्षिणी पश्चिमी मानसून हवायें प्रवाहित होती हैं | इनकी उत्पत्ति समुद्र से होने के कारण वाष्प से भरी होती है,  और इनसे ग्रीष्म ऋतु से वर्षा होती है | इस जनपद की जलवायु उपोष्ण मानसूनी है |

इस जनपद में मई एवं जून का औसत तापमान क्रमंश 30.38 अंश सेंटीग्रेट तथा 29.64 सेंटीग्रेट है | मई मास का तापमान 40.30 अंश सेंटीग्रेट रहता है | जनवरी माह का सर्वाधिक 21.75 अंश सेंटीग्रेट तथा औसत तापमान 13.81 अंश सेंटीग्रेट रहता है | इस समय सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित इस जनपद को सौर्यताप कम प्राप्त होता है | मई से अक्टूबर तक का दैनिक औसत तापमान 18 अंश सेंटीग्रेट से कम नहीं होता है | अप्रैल से सितम्बर माह का सर्वाधिक न्यूनतम तापमान 19.82 अंश सेंटीग्रेट से अधिक रहता है | कभी - कभी मई एवं अप्रैल के महीनों में पश्चिमी विक्षोभ के कारण तापमान में विषमता पायी जाती है |

वर्षा ऋतु : -

  हिमालय की तलहटी के निकट होने के कारण जनपद महाराजगंज की वार्षिक वर्षा प्रदेश के अन्य भागों से अधिक है | जनपद के उत्तरी भाग में वर्षा की मात्रा अधिक है | किन्तु दक्षिण भाग में वर्षा की मात्रा क्रमश: कम होती है | दक्षिण पश्चिमी मानसून का प्रभाव मध्य जून से प्रारम्भ होता है, तथा मध्य जुलाई तक सम्पूर्ण जनपद मानसून के प्रभाव में आ जाता है | जुलाई, अगस्त, तथा सितम्बर में मानसून का प्रभाव अधिक रहता है | बंगाल की खाड़ी से उत्पन्न होने वाले चक्रवात उत्तर पश्चिम दिशा की ओर से इस जनपद में प्रवेश करती है | इनके प्रभाव से जनपद की वर्षा प्रभावित होती है |

शीत ऋतु : -  सम्पुर्ण जनपद मध्य अक्टूबर से उत्तरी पूर्वी शीत ऋतु की मानसून के प्रभाव में आ जाता है | नवम्बर माह का औसत तापमान 20.6 डिग्री से०ग्रे० तथा दैनिक तापान्तर 16.510 से० ग्रे० कम रहता है | इस ऋतु में पश्चिम से आने वाले चक्रवातों से कुछ वर्षा हो जाती है | यह वर्षा इस जनपद के रबी के उत्पादन के लिए वरदान है | 

ग्रीष्म ऋतु : -  मार्च के प्रारम्भ होते ही तापमान में क्रमशः वृद्धि होने लगती है | मार्च माह का औसत तापमान 22.63 डिग्री से० ग्रे० रहता है | इस मग का उच्चतम तापमान 32.05 डिग्री से० ग्रे० तथा न्यूनतम तापमान 13.88 डिग्री से० ग्रे० है | ऋतु अप्रैल माह हा दैनिक तापान्तर 17.93 डिग्री से० ग्रे० तथा मई का दैनिक तापान्तर 18.24 डिग्री से० ग्रे० है | इस ऋतु में होने वाली वर्षा जायद फसल के लिए अच्छी होती है |

How to Reach Maharajganj

Maharajganj is well connected only by Road. It is about 60 Kms by Road from Gorakhpur.

Culture of Maharajganj, Uttar Pradesh

Cuisine of Maharajganj, Uttar Pradesh

Places of interest in Maharajganj, Uttar Pradesh

अदरौना लेहड़ादेवी का मं‍दिर


    

 यह जनपद का महत्‍वपूर्ण तीर्थ स्‍थल है इस स्‍थल पर फरेन्‍दा तहसील मुख्‍यालय से ब़जमनगंज मार्ग पर पॉंच कि0मी0 चलकर सड्क से 02 कि0मी0 पश्चिम जाकर पहुचा जा सकता है | प्राचीनकाल में यह स्‍थल आद्रवन नामक घने जंगल से आच्‍छादित था | यहाँ  पवह नामक प्राचीन नदी (अब नाला )  के तट पर मां बनदेवी दुर्गा का पवित्र मन्दिर अवस्थित है | लोकश्रुति एवं धार्मिक मान्‍यताओं के अनुसार इस देवची मन्दिर की स्‍थापना महाभारत काल में पाण्‍डवों के अज्ञातवास काल में स्‍वयं अर्जन ने की थी | इस धार्मिक स्‍थल का प्राचीन नाम 'अदरौना देवी थान ' रहा जो वर्तमान में लेहडा देवी मन्दिर के नाम से विख्‍यात है | प्राचीन लोक मान्‍यता के अनुसार महाभारत काल में पाण्‍डवों ने अपने अज्ञातवास की अधिकांश अवधि यही सघन 'आर्द्रवन' में व्यतीत की | इसी अवधि में अर्जुन ने यहाँ वनदेवी की अराधना की थी | आराधना से प्रसन्‍न होकर वनदेवी मां भगवती दुर्गा ने अर्जुन को अनेक अमोघ शक्तियां प्रदान की थी | तत्‍पश्‍चात मां भगवती के आदेशानुसार अर्जुन ने इस शक्ति पीठ की स्‍थापना की थी | बाद में यही 'अदरौना देवी'  के नाम से प्रसिद्ध हुई एक अन्‍य जुनश्रुती के अनुसार प्राचीनकाल में 'पवह नदी' को नाव से पार कर रही एक युवती को जब नाविको ने बुरी नीयत से स्‍पर्श करना चाहा था, तो वनदेवी मां ने उस युवती की रक्षा स्‍वयं प्रकट होकर की थी, तथा नाविकों को नाव समेत वही जल में समाधि दे दी थी |  इस घटना सें भी इस स्‍थल की महत्‍ता प्रतिपादित होती है | मन्दिर से कुछ ही दूरी पर एक प्राचीन तपस्‍थली (कुटी)  कई एकड् परिक्षेत्र में अवस्थित है, जहां अनेक साधू सन्‍तो की समाधिया है, जो इस तपस्‍थली से सम्बद्ध रहे और अपने जीवनकाल में यहा तपस्यारत रहे |  इन्‍हीं साधू योगियों में एक प्रसिद्ध योगी बाबा वंशीधर का नाम आज भी सन्‍तों द्वारा अत्‍यन्‍त आदर के साथ लिया जाता है |  वे एक सिद्ध योगी के रूप में विख्‍यात रहे हैं | योग बल पर उन्‍होनें कई चमत्‍कार और लोक कल्‍याण के कार्य किये थे | बाबा की शक्ति एवं भक्ति से प्रभावित कई वन्‍य जीव जन्‍तु भी उनकी आज्ञा के वशीभूत रहे | इनमें एक शेर एंव मगरमच्‍छ आज भी चर्चा के विषय बनते हैं, जिन्‍हें बाबा वंशीधर ने शाकाहारी जीव बना दिया था |

कटहरा के उभय शिवलिंग 


जनपद मुख्‍यालय से लगभग बारह कि0मी0 पश्चिम जंगल के छोर पर कटहरा ग्राम के समीप दो सामन्‍तर टीलों पर दो प्राचीन शिवलिंग, (कालें पाषाण खण्‍डों से निर्मित) है | इनमें से एक‍ शिवलिंग पर स्‍थानीय ग्रामवासियों ने एक मन्दिर का निर्माण अभी हाल के वर्षो में करा दिया है | किन्‍तु दूसरे टीले पर स्थित शिवलिंग ज्‍यों का त्‍यों खुले आसमान के नीचे मौजूद है | ऐतिहासिक साक्ष्‍यों के आधार पर यह क्षेत्र शैब एवं बौद्ध मताव‍लम्बियों से सम्बद्ध रहा है | वर्तमान में यहां शिवरात्रि के अवसर पर एक सांस्‍क़तिक मेले का आयोजन वर्षों से होता चला आ रहा है |  

बनर सिहागढ़ (वनरसिया कला)


जनपद के फरेन्‍दा सोनौली राजमार्ग से चलकर, कोल्‍हुई से आगे 'एकसड़वा' नामक स्‍थान से पूरब दिशा में सड़क मार्ग से चलकर राजपुर मुड़ली    होते हुए 'बनरसिंहागढ' (वनरसिया कला) पंहुचा जा सकता है |  मुख्‍यालय से पश्चिम जंगल क्षेत्र से  'चानकीघाट' होते हुए भी सीधे इस स्‍थल तक पहुचा जा सकता है | यहां लगभग 35 हेक्‍टेयर भूखण्‍ड पर कई टीले, स्‍ूतूप एवं तालाब मौजूद है | यहां एक प्राचीन शिवलिंग एवं एक चतुर्भुजी मूर्ति  भी विद्मानमान है | शिवरात्रि के अवसर पर यहां बडा मेला लगता है | कतिपय विद्वान इसे बीरगाथा काव्‍य के नायक आल्‍हा उदल के परमहितैषी , सैयदबरनस का किला भी मानते है | यह स्‍थल इस द़ष्टि से सामुदायिक सौहार्द का एक श्रेष्‍ठ उदाहरण सिद्ध होता है | कई पुरातत्‍वविद इसी को 'देवदह' भी मानते हैं |

इटहियां का शिव मंदिर -


जनपद के उत्‍तरांचल की तहसील निचलौल के मुख्‍यालय से चलकर ठूठीबारी मार्ग के बीच से इटहियां पहुचा जा सकता है यहॉं प्राचीन शिव मन्दिर अवस्थित है मेले का अयोजन यहा स्‍थानीय जनों के सहयोग से प्रतिवर्ष होता है, प्रति सोमवार को काफी भीड़ एकत्र होती है| 

महदेइयां का विष्‍णु मंदिर


यह जनपद मुख्‍यालय से दक्षिण भिटौली कामता मार्ग पर स्थित है | इसकी महत्‍ता इस रूप में निर्विवाद है कि यहॉं भगवान की मूर्ति स्थित है, जो अति प्राचीन है |  विष्‍णुमंदिर परिसर में ही स्थित तालाब से अत्‍य अनेक महत्‍वपूर्ण मूर्तियां भी प्राप्‍त हुई है |

बोकड़ा देवी स्‍थल


मुख्‍यालय से फरेन्‍दा जाने वाले मार्ग पर पकडी रेंज चौराहे से पश्चिम वनमार्ग होते हुए 3 कि0मी0 जंगल मार्ग पर ही एक उचें टीलानुमा स्‍थल पर बोकडा देवी मंदिर अवस्थित है | 

सोनाडी देवी स्‍थल


चौक वन क्षेत्र में यह स्‍थल है | वर्तमान में यहा 30-35 फीट उचा टीला स्‍तूपाकार विद्वमान है और आसपास छोट - बडे कई सरोवर भी है | इस द़ष्टि से सोनाडी देवी स्‍थल का महत्‍व और बढ जाता है | डा०  कृष्णानन्द त्रिपाठी सोनाडी देवी स्‍थल को 'श्रामणेर स्‍थल' के रूप में मानते हैं क्‍योकि इस स्‍थल पर स्थित विशाल वट वृक्ष हजारो वर्ष पुराना बताया जाता है जिसकी लटकी हुई शाखाएं भी अब वृक्ष बन चुकी है | ये वृक्ष एक अदभुत द़श्‍य प्रस्‍तुत करते है |  सोनाडी देवी स्‍थल पर गोरखपंथियों का एक मठ स्‍थापित |   

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